कविता

बुजुर्ग

विधा- कविता
शीर्षक- बुजुर्ग

आज बुजुर्गों का इतना अपमान हो रहा,
एकाकी जीवन जीने को कोई मजबूर हो रहा,
खून के रिश्तों पर आज स्वार्थ का परदा भारी है,
आभासी रिश्तों का आभासी वजूद मजबूर हो रहा।

खून पसीना एक करके, जो पौधे को सींचा करते थे,
अपनी परवाह न कर जिनकी परवाह किया करते थे,
आज उन्हीं छांव देने वालों को, धूप में जलना पड़ता है,
जो तब भी जिनको छांव देने के लिए धूप में जलते थे।

बुजुर्ग जो घर की रीढ़ थे, सलाह देने से कतराते हैं,
अपमानित न हों, सोच कर खुद खामोश रह जाते हैं,
बुजुर्गों और न‌ई पीढ़ी के बीच सामंजस्य ढीला हो रहा,
इसलिए बुजुर्ग ही सामंजस्य की जिम्मेदारी निभाते हैं।

पत्थर की मूर्तियों में तो भगवान को तलाशते हैं,
घर बैठे जीवित देवता को क्यों लोग बिसारते हैं?
ध्यान रहे ये ही अब भी तुम्हें सही राह दिखाएंगे,
आज भी वे कुर्बानी की राह पर चलते जाते हैं।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244