बुजुर्ग
विधा- कविता
शीर्षक- बुजुर्ग
आज बुजुर्गों का इतना अपमान हो रहा,
एकाकी जीवन जीने को कोई मजबूर हो रहा,
खून के रिश्तों पर आज स्वार्थ का परदा भारी है,
आभासी रिश्तों का आभासी वजूद मजबूर हो रहा।
खून पसीना एक करके, जो पौधे को सींचा करते थे,
अपनी परवाह न कर जिनकी परवाह किया करते थे,
आज उन्हीं छांव देने वालों को, धूप में जलना पड़ता है,
जो तब भी जिनको छांव देने के लिए धूप में जलते थे।
बुजुर्ग जो घर की रीढ़ थे, सलाह देने से कतराते हैं,
अपमानित न हों, सोच कर खुद खामोश रह जाते हैं,
बुजुर्गों और नई पीढ़ी के बीच सामंजस्य ढीला हो रहा,
इसलिए बुजुर्ग ही सामंजस्य की जिम्मेदारी निभाते हैं।
पत्थर की मूर्तियों में तो भगवान को तलाशते हैं,
घर बैठे जीवित देवता को क्यों लोग बिसारते हैं?
ध्यान रहे ये ही अब भी तुम्हें सही राह दिखाएंगे,
आज भी वे कुर्बानी की राह पर चलते जाते हैं।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
