कहानी

विरासत की छतरी

विधा- कहानी
शीर्षक- विरासत की छतरी

“ये सांध्य-वेला भी कितनी खूबसूरत होती है न!” सांध्य-वेला का नजारा देखते हुए नदी किनारे बैठे वृद्ध पति ने पत्नि से कहा.
“बहुत खूबसूरत, ढलते सूरज की लालिमा, पंछियों के नीड़ पर लौटने की प्रसन्नता, कभी प्यार कभी चिंता करते सारस युगल! पर जीवन-सांध्य और यह अकेलापन!” विरासत की छतरी उपेक्षित-सी होने पर वृद्धा की अकुलाहट मुखर थी.
“बावली! यह तो दुनिया की रीत है! हम भी तो अम्मा-बाबा को गांव में छोड़कर शहर आ गए थे! समय-समय पर सुध लेते रहते थे, जरूरत के समय उनके पास पहुंच जाते थे. हमारे बच्चों ने भी हमारे लिए सारी सुविधाएं जुटा दी हैं, रोज वीडियो पर बातें करते हुए ऐसा लगता है जैसे हमारे साथ ही हों.”
“फिर भी…”
“ये फिर, लेकिन, किंतु, परंतु ही जीवन-सांध्य तो क्या जीवन का सर्वनाश कर देते हैं! फिर, लेकिन, किंतु, परंतु करते ही जीवन रीत जाता है. संतुष्टि का सूर्य उदित ही नहीं होता. निशा के अंधकार के बाद ही भोर का प्रकाश नमूदार होता है.” पति ने आश्वस्त करते हुए कहा.
“सच कह रहे हैं आप, देखिए सारस युगल के मुखमंडल पर खुशी की आभा! उनके बच्चे भी लौट आए हैं न!” पत्नि के मुखमंडल पर भी खुशी की आभा दमक रही थी.”
“अम्मा-बाबा, आप कहां हैं?” तभी मोबाइल पर बहू की आवाज खनकी, “हम घर के बाहर खड़े हैं. जल्दी आइए, आपके पोते-पोती आपसे मिलने को लालायित हैं.” दोनों के के मुखमंडल पर खुशी की आभा और दमकी.
“आप लोग यहां कैसे?” पति ने पूछा
“बाबा, बच्चे कहने लगे थे कि हम दादी-दादू के साथ रहना चाहते हैं. आपके बेटे ने अब यहां ही नौकरी ढूंढ ली है.”
फिर, लेकिन, किंतु, परंतु तिरोहित हो चुके थे, संतुष्टि का सूर्य उदित हो गया था. विरासत की छतरी पुनः अपेक्षित जो हो गई थी!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244