कविता

कौन रखेगा हिसाब?

नियमों की ऐसी आंधी चली,
हर दिन नई किताब खुली,
कल जो था बिल्कुल जायज़,
आज वही बन गया गलती,
शिक्षक की पीड़ा कौन समझे,
कौन रखेगा हिसाब?
नियम बदलते रोज़ यहाँ,
बदल रहा है पूरा ख्वाब,
कभी कहा बस पढ़ाते रहिए,
कभी कहा रिकॉर्ड बनाइए,
कभी कहा ऑनलाइन भरिए,
फिर कहा ऑफलाइन भी लाइए,
कक्षा में बच्चे राह निहारें,
साहब फाइलें गिनते जाएं,
ज्ञान बांटने निकला शिक्षक,
कागज़ों में उलझा रह जाए,
वरिष्ठता भी रुक-रुक जाए,
आशाएं धुंधली होती जाए,
सेवा कब तक,कौन बताए?
बस आदेश नए आते जाए,
नियम ही नियम हैं भाई,
नियमों का क्या कहना,
शिक्षक चाहे कितना टूटे,
काम उसे ही करते रहना,
कभी प्रशिक्षण,कभी सर्वेक्षण,
कभी रिपोर्ट,कभी निरीक्षण,
कभी पोर्टल तो कभी ऐप,
शिक्षण गया कहीं बैकस्टेप,
मोबाइल बोले डेटा भरिए,
कंप्यूटर बोले फाइल चढ़ाइए,
बच्चा बोले सर,पढ़ा दीजिए,
शिक्षक बोले पहले ये कराइए,
नीति-निर्माता नीति लिखते,
नीचे वाले दर्द सहते,
कागज़ पर सब खूब सुहाना,
जमीनी सच से कौन है कहना?
शिक्षक पूछ रहा है आज,
मेरी सेवा का क्या हिसाब?
मेरे वर्षों का क्या मूल्य है?
कौन रखेगा मेरा हिसाब?
नियम अगर जनता के हित में,
तो शिक्षक भी उसमें शामिल हो,
शिक्षा सच में पहली प्राथमिकता,
तो शिक्षक का सम्मान भी हो,
कागज़ कम हों,कक्षा बढ़े,
बच्चों का भविष्य संवरने दो,
शिक्षक को शिक्षक रहने दो,
उसे हर काम का बाबू मत बनने दो,
वरना कल इतिहास पूछेगा
जब शिक्षा बेहाल हुई थी,
किसने रोका था शिक्षक को,
जब व्यवस्था सवाल हुई थी?
नियम रहें, व्यवस्था रहे,
पर न्याय भी साथ चले,
शिक्षक का श्रम,समय और सम्मान
किसी फाइल में बंद न रहे,
क्योंकि सवाल बहुत सीधा है
न भाषण चाहिए,न जवाब,
शिक्षक पूछ रहा है आज,
आख़िर कौन रखेगा हिसाब?

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554