गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दोनों दरयाओं ने जोड़े जब से रिश्ते प्यार के,
तब से बेहतर हो गये हैं ज़ोर इनकी धार के।

ईद और होली हमें दोनों गले मिलवाती हैं,
एक ही पैग़ाम हैं तेरे मेरे तहवार के।

जंग से इंसानियत का हर तरह नुक़़सान है,
जीतने वाले भी आते हैं बहुत कुछ हार के।

मैं नया राजा इन्हें देता हूं दर्जा बाप का,
जितने भी बूढ़े मुलाज़िम है मेरे दरबार के।

फूल और फल ही नहीं देते हैं यै केवल हमें,
साऐ भी बेहद घने होते हैं कुछ अशजार के।

जब उसी लड़की के छूते ही वो आया होश में
तब हकीमों ने ये जाना क्या हैं मानी प्यार के।

तितलियों की और बच्चों की ख़ुशी के सामने,
दाम फिर से कम लगे मुझको मेरे गुलज़ार के।

जब किसी ने ग़ौर से जांचा तो ये ज़ाहिर हुआ,
थे बहुत असबाब छोटे इस बड़ी तकरार के।

इन पे ही सारी इमारत का रखा होता है वज़्न ,
पर नज़र आते नहीं पत्थर हमें आधार के।

कम मुनाफ़ा और सामां कुछ ज़ियादा तोलना,
गाओं में कितने हसीं थे तब चलन ब्योपार के।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।