ग़ज़ल
दोनों दरयाओं ने जोड़े जब से रिश्ते प्यार के,
तब से बेहतर हो गये हैं ज़ोर इनकी धार के।
ईद और होली हमें दोनों गले मिलवाती हैं,
एक ही पैग़ाम हैं तेरे मेरे तहवार के।
जंग से इंसानियत का हर तरह नुक़़सान है,
जीतने वाले भी आते हैं बहुत कुछ हार के।
मैं नया राजा इन्हें देता हूं दर्जा बाप का,
जितने भी बूढ़े मुलाज़िम है मेरे दरबार के।
फूल और फल ही नहीं देते हैं यै केवल हमें,
साऐ भी बेहद घने होते हैं कुछ अशजार के।
जब उसी लड़की के छूते ही वो आया होश में
तब हकीमों ने ये जाना क्या हैं मानी प्यार के।
तितलियों की और बच्चों की ख़ुशी के सामने,
दाम फिर से कम लगे मुझको मेरे गुलज़ार के।
जब किसी ने ग़ौर से जांचा तो ये ज़ाहिर हुआ,
थे बहुत असबाब छोटे इस बड़ी तकरार के।
इन पे ही सारी इमारत का रखा होता है वज़्न ,
पर नज़र आते नहीं पत्थर हमें आधार के।
कम मुनाफ़ा और सामां कुछ ज़ियादा तोलना,
गाओं में कितने हसीं थे तब चलन ब्योपार के।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
