मुक्तक
जैसे तस्वीर कोई सजाती रही,
वो मुझे देखकर मुस्कुराती रही,
मैं अभी सिर्फ़ बच्चा था पर मेरी मां,
मुझको ख़्वाबों में दूल्हा बनाती रही।
मेरी ख़ातिर वो ख़ुद को सताती रही,
सर्द पानी के छींटे भी खाती रही,
मां को बारिश में छाता थमाया तो वो,
सारा मेरी तरफ़ ही झुकाती रही।
अपनी बीमारी को वो भुलाती रही ,
मेरे सुख पर ही नज़रें टिकाती रही,
सांस की उसको तकलीफ़ थी फिर भी मां ,
मेरे सारे ग़ुबारे फुलाती रही।
मुझ पे ममता का सागर लुटाती रही ,
वो मेरी मां है अक्सर बताती रही,
जाड़े में एक कम्बल ही काफ़ी था पर ,
मां मुझे दूसरा भी उढ़ाती रही।
मुझको बिल्ली की बोली सुनाती रही,
नाच भालू का मुझको दिखाती रही,
इस जतन में कि बेशक वो थक जाती थी,
मां मुझे दूध फिर भी पिलाती रही।
ग़लतियों पर सज़ा से बचाती रही,
एक दो डंडी वो ख़ुद भी खाती रही ,
बाप ने जब मुझे पीटना चाहा तो,
मां मुझे अपने पीछे छुपाती रही।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
