कविता

कविता

ना उसका चेहरा तकते थे,
ना उससे कुछ बतियाते थे,
मां ने जिस पर उंगली रख दी,
वो लड़की घर ले आते थे,
तब लड़के मां के बेटे थे,
दादा हमको बतलाते थे।

गाड़ी के अंदर औरत को ,
जब भी मुश्किल में पाते थे,
लड़कों का तो कहना ही क्या,
कुछ बूढ़े भी उठ जाते थे,
तब मां बहनों की इज़्ज़त थी,
दादा हमको बतलाते थे।

कुत्ते और गाऐ की रोटी,
सब से पहले बनवाते थे,
मानव का तो कहना ही क्या,
पशुओं से भी ये नाते थे,
तब मानव सच में मानव था,
दादा हमको बतलाते थे।

अपने अपने घर की सब्ज़ी,
मिलने वाले दे जाते थे,
ज़रदारों से बेहतर खाना,
हम ग़ुरबत में भी खाते थे,
तब गाओं में प्यार बहुत था,
दादा हमको बतलाते थे।

बिल्कुल दूध नहीं देती थी ,
फिर भी उसको सहलाते थे,
बूढ़ी गाऐ को भी दादा ,
खल चूरी ही खिलवाते थे,
जीवन में उपकार न भूलो,
दादा हमको बतलाते थे।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।