सत्य
जो वस्तु जैसी हो, उसे वैसा ही जानना, वैसा ही मानना, वैसा ही लिखना, वैसा ही बोलना, और वैसा ही व्यवहार करना, यह सत्य कहलाता है।
ईश्वर एक है। तो उसे एक ही जानना, एक ही मानना, एक ही बोलना, एक ही लिखना और एक मानकर ही सारे व्यवहार करना, यह सत्य है। ईश्वर सर्वव्यापक और निराकार है। तो उसे ऐसा ही जानना मानना लिखना बोलना और निराकार मानकर ही व्यवहार करना यह सत्य है।
ईश्वर न्यायकारी है। तो उसे न्यायकारी ही जानना मानना लिखना बोलना और न्यायकारी मानकर ही सारे व्यवहार करना, झूठ छल कपट अन्याय धोखाधड़ी इत्यादि पाप कर्म नहीं करना, सेवा परोपकार दान दया यज्ञ संध्या आदि उत्तम कर्मों का आचरण करना, यही सत्य है।
क्योंकि हम दंड भोगना नहीं चाहते। यदि बुरे काम करेंगे, तो ईश्वर दंड देगा। माफ तो वह करता नहीं, और दंड हम भोगना चाहते नहीं।इसलिए यदि हम ईश्वर को न्यायकारी मानते हैं, तो सब अच्छे काम ही करने होंगे, यही सत्य है।
आत्मा ईश्वर से भिन्न वस्तु है। वह अल्पज्ञ एक देशी कर्म करने में स्वतंत्र और फल भोगने में पराधीन है, ऐसा ही जानना मानना लिखना बोलना और व्यवहार करना सत्य है।
इसी प्रकार से प्रकृति इन दोनों से भिन्न वस्तु है। आत्मा और ईश्वर चेतन हैं, प्रकृति जड़ वस्तु है। यह सुख दुख और मोह देने वाली है अर्थात अविद्या को उत्पन्न करती है। ऐसा ही जानना मानना लिखना बोलना और व्यवहार करना सत्य है।
मैंने थोड़ा सा संकेत किया, इसी प्रकार से आप सब क्षेत्रों में सत्य का स्वरूप समझ लेंगे।
— हेमंत सिंह कुशवाह
