कहानी

एक अधूरी मोहब्बत, एक मुसाफ़िर और प्रकृति की गोद

उस सुबह मैं घूमने नहीं निकला था… मैं तो अपने ही टूटे हुए दिल से दूर भागना चाहता था।
हर कदम के साथ उसकी यादें मेरा पीछा कर रही थीं। वह चेहरा, जिसकी मुस्कान कभी मेरी दुनिया थी, आज किसी और की दुनिया बनने जा रही थी। मैं लाख कोशिश करता कि उसे भूल जाऊँ, पर कुछ लोग दिल से नहीं, साँसों से जुड़ जाते हैं।
चलते-चलते मैं उस शांत हरियाली में पहुँच गया। चारों ओर फैले पेड़, भीगी मिट्टी की खुशबू, हवा की धीमी सरसराहट और दूर तक पसरा सन्नाटा… ऐसा लग रहा था मानो पूरी प्रकृति मेरे दर्द को बिना सुने ही समझ गई हो।
मैं एक पुराने बरगद के नीचे बैठ गया। उसकी जड़ों को देखकर लगा जैसे उसने भी सदियों से किसी अपने का इंतज़ार किया हो। उसकी शाखाएँ आकाश की ओर फैली थीं, जैसे हर रोज़ भगवान से एक ही सवाल पूछती हों— “जो अपने होते हैं, वही बिछड़ क्यों जाते हैं?”
मेरी आँखों से एक आँसू गिरा… वह मिट्टी में समा गया।
तभी लगा जैसे धरती माँ ने उसे अपने आँचल में छिपा लिया हो। शायद इसलिए कि दुनिया आँसुओं की कीमत नहीं समझती, लेकिन प्रकृति हर दर्द को अपने भीतर सहेज लेती है।
हवा का एक झोंका आया। पेड़ों के पत्ते एक साथ हिले। ऐसा लगा जैसे कोई कह रहा हो— “मत रो… कुछ लोग साथ निभाने नहीं, जीवन का अर्थ सिखाने आते हैं।”
मैं फूट-फूटकर रोना चाहता था… पर आवाज़ गले में ही अटक गई। मैंने आसमान की ओर देखा। बादल भी चुप थे। शायद वे भी किसी अधूरी कहानी का बोझ उठाए घूम रहे थे।
तभी एक सूखा पत्ता मेरी हथेली पर आ गिरा। मैं उसे देर तक देखता रहा। वह कभी इसी पेड़ का हिस्सा था। आज उससे अलग होकर मिट्टी की ओर लौट रहा था।
तभी मन ने कहा— “हर बिछड़ने वाला बेवफ़ा नहीं होता… कुछ रिश्तों की उम्र बस इतनी ही लिखी होती है।”
मैंने उस पत्ते को सीने से लगा लिया। उस पल लगा… मैं और वह सूखा पत्ता एक जैसे हैं। दोनों कभी किसी की शाखा थे… आज दोनों हवा के भरोसे हैं।
सूरज धीरे-धीरे बादलों से बाहर निकला। उसकी हल्की किरणें मेरे चेहरे पर पड़ीं। मैंने पहली बार महसूस किया कि अँधेरा हमेशा नहीं रहता। कुछ लोग लौटकर नहीं आते… लेकिन उनके दिए हुए एहसास ज़िंदगी भर साथ चलते हैं।
मैं उठा… पीछे मुड़कर उस पेड़ को देखा। ऐसा लगा जैसे वह मुस्कुरा रहा हो। जैसे कह रहा हो— “मोहब्बत अगर सच्ची हो, तो उसका अंत बिछड़ना नहीं होता… वह इंसान के चरित्र में बस जाती है।”
मैं खाली हाथ लौटा था… लेकिन उस दिन प्रकृति ने मुझे सबसे बड़ी दौलत दे दी— टूटकर भी मुस्कुराने का साहस। और आज भी जब कभी दिल बहुत ज़्यादा रोता है… मैं उसी पेड़ के पास चला जाता हूँ। क्योंकि वहाँ कोई सवाल नहीं पूछता… वहाँ सिर्फ़ हवा होती है… पेड़ होते हैं… और मेरी अधूरी मोहब्बत की खामोश गूँज।

— धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा - परिचय जन्म स्थान: ग्राम रानपुर (अंबाह, मुरैना, मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती सोमवती जी और श्री कृष्ण शर्मा शिक्षा: बी.एससी. नर्सिंग, एम.एससी. (रसायन विज्ञान), डी.सी.ए. और वर्तमान में एम.एससी. (जूलॉजी) में अध्ययनरत। प्रमुख रचनाएँ: काव्य-संग्रह: ‘ख़ामोशी के अल्फ़ाज़’ उपन्यास एवं कहानियाँ: ‘भाई फिर बटवारा क्यों?’, ‘वैश्या ही चरित्रहीन क्यों?’, ‘भाई मुझे तुम पर भरोसा है’, ‘4 साल 230 दिन’, और ‘अधूरी मोहब्बत की दास्तान’। विशेषता: ग्रामीण परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति। M= 90391 04716