कविता

घड़ी मिलन की आने को है

विधा- कविता
शीर्षक- घड़ी मिलन की आने को है

चलती रेल की खिड़की,
क्या-क्या दिखाती है,
हर पेड़ पीछे छूट रहा,
हर पत्ती झूमती जाती है।

दौड़ रहे होंगे दृश्य आज भी,
मुझको इल्म नहीं है,
मैं तो तेरे अक्स में डूबा,
लगता तू भी यहीं है।

प्रेम का प्याला तूने ऐसा पिलाया,
सुधबुध सब बिसराई,
रेल की रेलमपेल में भी मुझे,
लगती निपट तन्हाई।

तू भी अपना हाल बता प्रिये,
याद मेरी कभी आई!
करवट लेते रैना बीती या,
या लेते-लेते अंगड़ाई!

अब तो सफर समाप्त हो रहा,
घड़ी मिलन की आने को है,
हम-तुम दोनों साथ ही होंगे,
अक्स तैयार तेरा जाने को है!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244