घड़ी मिलन की आने को है
विधा- कविता
शीर्षक- घड़ी मिलन की आने को है
चलती रेल की खिड़की,
क्या-क्या दिखाती है,
हर पेड़ पीछे छूट रहा,
हर पत्ती झूमती जाती है।
दौड़ रहे होंगे दृश्य आज भी,
मुझको इल्म नहीं है,
मैं तो तेरे अक्स में डूबा,
लगता तू भी यहीं है।
प्रेम का प्याला तूने ऐसा पिलाया,
सुधबुध सब बिसराई,
रेल की रेलमपेल में भी मुझे,
लगती निपट तन्हाई।
तू भी अपना हाल बता प्रिये,
याद मेरी कभी आई!
करवट लेते रैना बीती या,
या लेते-लेते अंगड़ाई!
अब तो सफर समाप्त हो रहा,
घड़ी मिलन की आने को है,
हम-तुम दोनों साथ ही होंगे,
अक्स तैयार तेरा जाने को है!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
