लघुकथा

खुशी की बारिश!

बारिश भी मौसम-बेमौसम आती रहती है और यादें भी! फिर जब बारिश हो, हाथ में गर्मा-गर्म चाय का प्याला हो, बड़े-से घर में कोई चाय में साथ देने वाला न हो तो यादें ही हमसफ़र बन जाती हैं. नव्या के साथ यही हो रहा था.
बाहर झमाझम बारिश हो रही थी. खिड़की के शीशे पर बारिश की बूँदें लगातार दस्तक दे रही थीं. हवा के साथ बाहर आम के पेड़ की डालियाँ हवा झूम रही थीं और आँगन में जमा पानी में छोटी-छोटी लहरें उठ रही थीं. भरे-पूरे घर वाली नव्या अब नितांत अकेली हो गई थी. पति दूसरी दुनिया चले गए, बेटा-बेटी दूसरे देशों में. बेटा-बेटी अपने पास आने को कहते, पर वह अपना देश छोड़कर जाने को तैयार कहाँ थी! एक भाई, वह भी विदेश में! खिड़की के पास बैठी हाथ में गर्मा-गर्म चाय का प्याला लेकर 80 वर्षीय नव्या चाय और बारिश से ज्यादा यादों में खोई हुई थी.
ऐसे ही बारिश के मौसम में भाई के साथ कागज की नावें चलाती, छपक-छपाक करती, मां की प्यार भरी डांट के बाद गर्मा-गर्म पकौड़े और सूजी का हलवा खाने को मिलता तो डांट, झिड़कियां, थप्पड़- सब पीछे छूट जाते.
भाई-बहन की चुटीली बचपन की लड़ाई, बचपन की वह नटखट नोकझोंक, कभी खिलौने के लिए तकरार, कभी छोटी-सी बात पर रूठना, कभी एक-दूसरे की शिकायत और अगले ही पल फिर साथ खेलना, बचपन की वो अनमोल स्मृतियाँ उम्र के साथ और भी प्यारी हो गई थीं.
रक्षा-बंधन आने वाला था. कई सालों से रक्षा-बंधन ऑनलाइन ही हो रहा था. उसमें ऐसा मजा कहाँ. अब भाई भी तो लगभग उसी की उम्र का हो गया था. विदेश से कहाँ आ पाता था! नव्या अब भी अपने हाथ से बनाई रेशम के धागों की राखी ही उसे भेजती थी. इस बार भी वह राखी बनाए बैठी थी.
यही सब सोचते-सोचते चाय ठंडी हो रही थी या बारिश गर्म हो रही थी, उसे पता नहीं चला. चलता भी नहीं, अगर मोबाइल की घंटी से उसकी तंद्रा नहीं टूटती!
“दीदी, क्या हाल हैं?” उधर से आवाज आई.
“रोहित…! आज कैसे याद कर लिया बहिन को!” नव्या की वही स्नेहिल शिकायत!
“आप याद करती हैं तो क्या हम नहीं कर सकते! राखी पोस्ट कर दी क्या?”
“नहीं की तो करना भी मत, इस बार मैं आपके हाथ से राखी बंधवाकर आपके हाथ से बनाए हुए लड्डू खाना चाहता हूँ! और हाँ लड्डू ज्यादा बनाना, मैं सपरिवार आ रहा हूँ, मेरी भानजी-भानजा भी सपरिवार आ रहे हैं. खूब सारा इंतज़ाम करके रखना.” नव्या का जवाब सुने बिना ही भाई बोलता चला गया.
बाहर की बारिश अब नव्या को अच्छी लग रही थी, भीतर भी खुशी की बारिश से भीग जो चुकी थी!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244