मानवता
विधा- कविता
शीर्षक- मानवता
संकल्प करके विकल्प को क्यों देखना!
साहस हो जब साथी, भय क्यों करना!
साक्षी हो तुम जगत के अदृश्य तो नहीं,
सत्य से नहीं असत्य से सदा ही डरना।
सत्य सुंदर है, उसे कुरूप क्योंकर कहिए,
समाज में समानता रखिए भेदभाव से डरिए,
ऊंच-नीच, अच्छा-बुरा, खरा-खोटा भूलकर,
मानव हैं मानवता से ही पक्का नाता रखिए।
समय कभी एक-सा नहीं रहता, यह ध्यान रहे,
इंसानियत छोड़ हैवानियत-सरिता में कौन बहे,
नर-तन दे उपकार किया प्रभु ने कृतज्ञ हैं हम,
मानुष-जन्म अमोलक हीरा, कौड़ी फिर कौन गहे!
सत्य-अहिंसा के इस पावन देश के हम वासी,
आत्मविश्वास रखें क्यों बनें किसी के न्यासी,
अपना जीवन, अपनी चाहत, अपनी राहत हो,
स्वाभिमान रखे प्रसन्नचित्त, क्यों रहें उदासी!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
