मैं नदी हूँ
विधा – बाल कविता
विषय – मैं नदी हूँ
मैं नदी हूँ
पर्वतों से निकलती हूँ
खेतों और घाटियों से होती हुई
आगे बढ़ती रहती हूँ।
मुझे बहने से
कोई रोक नहीं सकता
भले ही मुझ पर बांध बना लो
समुद्र से मिलन में
कोई टोक नहीं सकता।
तुम छोटे बच्चे हो,
तुम्हारी बात सब मानते हैं,
मुझ में कितना कचरा है,
कचरा निपटाना बड़े जानते हैं।
कचरा तुम्हें ही नुकसान देगा,
कचरा बीमारियों का घर है,
मैं देती हूँ सबको निर्मल जल,
कचरा मेरा-तुम्हारा दुश्मन है।
सबको मेरी व्यथा सुनाओ,
मुझे साफ रखने का जतन करो,
मैं तुम्हें जल देकर तुम्हारे कष्ट हरती हूँ,
तुम सब भी प्रयास करके मेरे कष्ट हरो।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
