संजय को दिव्यदृष्टि मिलने का सत्य
‘महाभारत’ महाकाव्य में संजय एक प्रमुख पात्र है। वह राजा धृतराष्ट्र का सारथी, व्यक्तिगत सचिव, और सलाहकार ही नहीं, बल्कि मित्र भी था। वह सदा धृतराष्ट्र को उचित सलाह देता था और आवश्यक होने पर उनकी आलोचना भी करता था। यह बात अलग है कि धृतराष्ट्र उसकी सलाह को कितनी मानते थे और कितनी नहीं।
इसी संजय के बारे में प्रसिद्ध है कि राजा धृतराष्ट्र ने उसको महाभारत युद्ध के समाचार सुनाने का दायित्व सौंपा था। महाकाव्य में ऐसा उल्लेख है कि हस्तिनापुर में बैठे हुए ही कुरुक्षेत्र में चल रहे युद्ध को अपनी आँखों से देखने के लिए महामुनि वेद व्यास ने संजय को दिव्यदृष्टि प्रदान की थी, जिसके प्रभाव से वह युद्ध के किसी भी भाग को देख सकता था और योद्धाओं के बीच हो रहे वार्तालाप को भी सुन सकता था। महाकाव्य में यह भी उल्लेख है कि युद्ध समाप्त होने के बाद वेद व्यास जी ने संजय से वह दिव्यदृष्टि वापस ले ली थी।
इन्हीं उल्लेखों के आधार पर अनेक लोग यह दुराग्रह करते हैं कि वेद व्यास जी ने वास्तव में संजय को दिव्यदृष्टि दी थी और उसी के कारण वह हस्तिनापुर में ही बैठे रहकर युद्ध का आँखों देखा हाल अन्धे राजा धृतराष्ट्र को ठीक उसी तरह सुना रहा था जैसे किसी क्रिकेट मैच की रनिंग कमेंट्री यानी आँखों देखा हाल रेडियो पर सुनाया जाता है। बी.आर. चोपड़ा ने ‘महाभारत’ नामक जो प्रसिद्ध सीरियल बनाया था, उसमें भी ऐसा ही दिखाया गया था।
परन्तु हमारे विचार से संजय को दिव्यदृष्टि मिलने की बात पूरी तरह असत्य और काल्पनिक है। यह बात हम विश्वासपूर्वक इसलिए कह पा रहे हैं कि ‘महाभारत’ महाकाव्य के भीतर ही ऐसे अनेक ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं जिनसे दिव्यदृष्टि मिलने की बात असत्य सिद्ध होती है। आप जानते हैं कि प्रारम्भ में इस महाकाव्य का आकार बहुत छोटा था और बाद में वेद व्यास जी के शिष्यों तथा अन्य लोगों ने इसमें भारी मिलावट करके बहुत-सी बातें जोड़ दी थीं और उनमें कई बातें परस्पर विरोधी हैं। संजय को दिव्यदृष्टि मिलने की यह बात भी उनमें से एक है। इस लेख में हम ऐसेे सभी प्रमाणों का उल्लेख नहीं करेंगे, लेकिन प्रमुख प्रमाणों की चर्चा अवश्य करेंगे।
पहली बात तो यह है कि यदि वेद व्यास में किसी को दिव्यदृष्टि देने की शक्ति थी और वे राजा धृतराष्ट्र को युद्ध दिखाना आवश्यक मानते थे, तो सीधे धृतराष्ट्र को ही दिव्यदृष्टि दे सकते थे। संजय को बीच में लाने की आवश्यकता ही क्या थी?
दूसरी बात यह है कि श्रीमद् भगवद्गीता के पहले ही श्लोक में राजा धृतराष्ट्र संजय से पूछ रहे हैं कि ‘मेरे और पांडु के पुत्रों ने कुरुक्षेत्र में जाकर क्या किया यह मुझे बताओ।’ यह प्रश्न ही भूतकाल के बारे में है। यदि संजय अपनी दिव्यदृष्टि से वहीं बैठकर युद्ध देख रहा होता, तो प्रश्न इस प्रकार होता कि ‘बताओ मेरे और पांडु के पुत्र क्या कर रहे हैं?’ परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं पूछा। इससे सिद्ध होता है कि संजय केवल एक संवाददाता था और राजा धृतराष्ट्र उससे समाचार पूछ रहे थे।
तीसरी बात यह है कि संजय ने युद्ध के एक भाग का ही समाचार धृतराष्ट्र को सुनाया था, पूरे युद्ध का नहीं। वह युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण भाग में उपस्थित रहकर युद्ध देखता था और उसका समाचार एकत्र करता था। उदाहरण के लिए, चक्रव्यूह वाले दिन संजय ने धृतराष्ट्र को व्यूह के प्रथम द्वार पर (अर्थात् व्यूह के बाहर-बाहर) होने वाले युद्ध का ही विवरण सुनाया था, जहाँ पर गुरु द्रोणाचार्य खडे थे और उस द्वार की रक्षा कर रहे थे। एक बार भी संजय ने व्यूह के भीतर का विवरण नहीं सुनाया कि अभिमन्यु ने व्यूह के दूसरे, तीसरे, चौथे आदि द्वारों को कैसे तोड़ा और इसके लिए उसे किस-किससे युद्ध करना पड़ा।
इसी प्रकार अर्जुन को कई दिन संशप्तकों से युद्ध करने के लिए कुरुक्षेत्र से बाहर जाना पड़ा था, परन्तु संजय ने एक बार भी उस युद्ध का हाल नहीं बताया। बस अन्त में केवल यह बताया कि अर्जुन ने उस दिन किस-किस संशप्तक योद्धा को मार डाला था। इसी तरह और भी कई मुख्य युद्धों का उसने हाल नहीं सुनाया, बल्कि संक्षेप में मात्र परिणाम बताया था।
इससे यही सिद्ध होता है कि संजय के पास कोई दिव्यदृष्टि नहीं थी, बल्कि वह एक संवाददाता के रूप में युद्धक्षेत्र में उपस्थित रहकर समाचार एकत्र किया करता था और फिर अवसर के अनुसार कुरुक्षेत्र से हस्तिनापुर जाकर वे समाचार राजा धृतराष्ट्र को सुनाया करता था। युद्ध के सत्रहवें दिन तो स्वयं संजय द्वारा कौरवों के पक्ष में लड़ने का उल्लेख है। एक ही व्यक्ति दो जगह कैसे उपस्थित रह सकता है?
यह अवश्य है कि कुरुक्षेत्र से हस्तिनापुर बहुत दूर है और उस समय उपलब्ध एकमात्र तेज साधन घोड़े द्वारा किसी को आने-जाने में दो-तीन घंटे लगते होंगे। इसलिए संजय का प्रतिदिन आना-जाना सम्भव नहीं था। अतः वह अवसर के अनुसार किसी दिन कोई विशेष घटना होने पर जल्दी निकल जाता था और समाचार सुनाकर अगले दिन प्रातः युद्ध प्रारम्भ होने के समय तक लौट आता था।
ऐसा पहला अवसर वह था जब पितामह भीष्म धराशायी हुए थे। दूसरा अवसर वह था जब गुरु द्रोणाचार्य की हत्या हुई थी और तीसरा अवसर वह था जब कर्ण की मृत्यु हुई थी। अन्तिम बार वह भीम के साथ गदायुद्ध में दुर्योधन के धराशायी होने पर इसका समाचार देने हस्तिनापुर गया था और अपने साथ कौरवों की बहुत-सी महिलाओं को भी ले गया था।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि संजय को दिव्यदृष्टि मिलने की बात असत्य और काल्पनिक है तथा संजय कोई दिव्यदृष्टि धारक नहीं, बल्कि केवल एक युद्ध संवाददाता था।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 7, सं. 2083 वि. (21 अगस्त, 2026)
