पीहर प्यारा लागे रे
समय चक्र घूमता रहा। मालती अपने परिवार के सुख-दुःख में ऐसे उलझी रही कि मायके जाकर अपने माता पिता के राज में, अपने भाई बहन के साथ राजी खुशी के कुछ पल बिताना, हँसी ठिठोली का आनंद लेना भी संभव नहीं हुआ। जिम्मेदारियों का बोझ उठाते-उठाते यौवन बीत कब सांझ बेला ने दस्तक दी, पता ही न चला।
कुछ तो जमाई राजा के नखरे ज्यादा ही थे। कुछ अमीरी का रूआब भी। मायके में उनका आना कभी प्रिय नहीं रहा। हर बात में मीन-मेख निकालना, टोका-टोकी कौन पसंद करेगा। जमाई है तो क्या हुआ? धीरे-धीरे मालती जी का पीहर आना छूटता गया। माता पिता थे तब तक घंटे दो घंटे ही सही, वे पीहर आती। सुंदर सी साडी पहन, आभूषण पहन सज-धज इतराती, इठलाती। चेहरा खुशी से दमकता। चहकती हुई अपनी देवरानी से कहती,.” मायका बुला रहा है। माँ के हाथ के बने मीठे चावल की खुशबू से मन महक रहा है। तुम भी चलो मेरे साथ।”
देवरानी के भाई नहीं था। मिलती जी मेधा जी को भी अपने साथ ले जाती। अपनी दोनों बिटिया, देवर के नन्हे आशु को भी साथ ले जाती। उनकी बहन उर्मिला जी की गुड़िया, भतीजा रोमेश सब साथ खेलते। थाली सजाकर बड़े प्रेम से भैया भाभी की.आरती उतारती। हाथ से बनी मिठाई खिलाती। राखी बांधकर ढेर सारी दुआएं देती। समय फुर्र से उड़ जाता। भारी मन से वह लौट आती। मधुर स्मृतियां साथ ले।
माता पिता के देहावसान के बाद आज पहली राखी है। ” दीदी, आपको आना ही है।” मायके का बुलावा आया है। उसने तो मन ही नहीं जाने का निश्चय किया था। मन ही नहीं हो रहा था। क्या करूँ वहां जाकर। सूनी पड़ी है मायके की गलियां। कौन है वहां जो दरवाजे की तरफ टकटकी लगाये बैठा होगा? बेचैनी से चहलकदमी करते पापा बाट निहार रहे होंगे।
भतीजा भतीजी अब बड़े हो गए है। “भुआसा, प्रणाम। कैसी हो?” कहकर अपने कमरे में चले जाएंगे। पहले जैसी रौनक अब कहां। वह चहचहाहट अब कहां। हर कोई अपने मोबाइल में व्यस्त हैं। भैया भाभी उम्र बढ़ते थक गए हैं। बहुओं का राज हैं। चरण स्पर्श कर सब अंदर चली गई। स्नेह की नमीं कैसे सूख गई?
सोच रही है जल्द से राखी बुधवार ले भैया। उसे घर जाना है। यादों की गठरी ले वह लौट गई है। मन की कसक चुभती है तो आँखों से झर-झर धारा बहने लगती है। “क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा?” पति महोदय इतना पुष्कर अपने काम में व्यस्त हो जाते है। कुम्हलातें रिश्तों को उसे नेह से सींचना हैं।
मायका बुला रहा है। अपने पीहर वह जरूर जाएगी। चाहे मनचाहा स्वागत हो न हो। मालती जी हमेशा की तरह सज-धज, सुंदर सी साड़ी पहन अपनी आलिशान कार में मायके जा रही है। आज उसके साथ उसकी देवरानी नहीं है। सास-ससुर जी के दुनिया से विदा लेते ही दोनों भाइयों के बीच व्यापार के बँटवारे के कारण मनमुटाव हो गया था। अकेली ही वह मायके होकर आ जाएगी।
