भजन/भावगीत

भव से तर जाना सरल है

आ गए मोहन ह्रदय में अब निकल पाना कठिन है
भव से तर जाना सरल है-
1.
सौप दी जब डोर जीवन की प्रभु के हाथ में
सारथि हों जब प्रभु तो रथ का सधना भी सरल है भव से तर-
2.
गहरी नदिया नाव पुरानी मीलों तक पानी-ही-पानी
हों खिवैया जब प्रभु तो नाव का तरना सरल है भव से तर-
3.
बनके चातक स्वाति-प्रभु की छांव में जो रह सके
स्वाति की इक बूंद ही से भीगना उसका सरल है भव से तर-
4.
वरद-हस्त प्रभु ने जिसके शीश पर हो रख दिया
उसकी तृष्णा बुझ गई है तृप्त हो जाना सरल है भव से तर-
5.
जन्मों की भटकन थमी जब शरण प्रभुवर की मिली
हों दरश कण-कण में प्रभु के शांति का मिलना सरल है भव से तर-

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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