दर्द
अक्सर मेरे कुछ चाहने वाले
मुझे फोन करते हैं,
कहते हैं —
“सुरेंद्र, अब तू फोन नहीं करता,
हमारा हाल नहीं लेता।”
अब मैं क्या कहूँ?
मैं उलझा हूँ
अपने संसार ए झमेलों में,
टूटते मेरे आत्मिक बसेरों में।
कुछ सुलझने लगता हूँ,
तो
एक और नई ज़िम्मेदारी
याद आ जाती है।
भविष्य की चिंता मुझे सताती है।
हाँ, मानता हूँ
उलझे तो सभी हैं,
शायद मैं अभी नया हूँ
इस उलझन में।
वैसे मैं थोड़ा मूर्ख भी हूँ
फैसलों ए मदाने में।
अक्सर सोचता कुछ हूँ,
हो जाता कुछ और है।
जाना, गरीबी का बोझ है,
या मेरा ही कोई दोष है?
गरीबी क्यों है?
ये दुःख क्यों है?
क्यों जीवन की राहों में
इतना संघर्ष बिखरा है?
और क्यों हर चेहरे के पीछे
कोई न कोई दर्द छिपा है?
— सुरेन्द्र कल्याण बुटाना
