चेक बाउंस का आख़िरी मौका
चेक बाउंस की कहानी ने, नया मोड़ लिया है,
राजपाल के हिस्से में, सुको ने मौका दिया है।
दो हफ्तों में भरो, वरना मुश्किल बढ़ जाएगी,
कानून की चौखट पे, हर चाल नज़र आएगी।
कभी फिल्मों में हँसाते थे, किरदार कमाल थे,
असली जिंदगी के सीन में, हिसाब न पाते थे।
करोड़ों का चेक था, मामला छोटा कैसे होता?
कागज़ पर लिखी रकम, एक “तकाज़ा” होता।
कोर्ट ने कहा-मौका है, बात अब बन सकती है,
जो रकम बाकी है, वह अब जमा हो सकती है।
फिल्मी पर्दे पर जब चाहे, हँसी के फव्वारे छूटें,
कानून की पटकथा में, तारीख व रकम न रूठें।
ये कहानी बताती है, हँसी-मजाक अपनी जगह,
चेक पे दस्तखत करने से पूर्व, सोचना बेहतर है।
क्योंकि पर्दे पे “कट” कहने से, “दृश्य” रुकता है,
कोर्ट की पटकथा में, हिसाब पूरे करने पड़ते है।
(संदर्भ – राजपाल यादव, सुप्रीम कोर्ट ने दिया आखिरी मौका)
— संजय एम तराणेकर
