दीपावलीः भीतर के प्रकाश और परंपराओं के उत्सव की शृंखला
दीपावली केवल दीपों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का महाउत्सव है। शरद ऋतु की अमावस्या की काली रात को जब देश का कोना-कोना अनगिनत दीयों की रोशनी से जगमगा उठता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती पर देवता स्वयं उतर आए हों। दीपावली भारतीय संस्कृति का वह दर्पण है, जिसमें हमारी पौराणिक मान्यताएं, पारिवारिक मूल्य और सामाजिक समरसता पूरी भव्यता के साथ दिखाई देती हैं। दीपावली के उत्सव से हफ्तों पहले ही घरों और बाजारों में एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। लोग अपने घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन और सजावट में जुट जाते हैं। इसके पीछे यह गहरा विश्वास है कि स्वच्छता और पवित्रता में ही धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी का वास होता है। बाजारों में रौनक अपने चरम पर होती है। मिट्टी के दीये, रंग-बिरंगी लाइटें, गेंदे के फूलों की मालाएं, खील-बताशे और तरह-तरह की मिठाइयों से दुकानें सजी होती हैं। हवा में एक विशेष प्रकार का उत्साह और सोंधी महक घुली होती है, जो हर दिल को खुशियों से भर देती है।
बहरहाल, दीपावली का त्योहार किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, जो इसके महत्व को और अधिक गहरा बनाती हैं। दीपावली से जुड़ी सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य कथा भगवान विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्र जी से जुड़ी है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब लंकापति रावण का वध करके, चौदह वर्ष का कठिन वनवास पूरा कर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों के हर्ष की कोई सीमा नहीं थी। उस दिन कार्तिक मास की घने अंधकार वाली अमावस्या थी। अपने प्रिय राजा के स्वागत में पूरी अयोध्या नगरी को घी के दीये जलाकर आलोकित किया गया था। तब से लेकर आज तक, उसी प्रकाश पर्व की स्मृति में हर साल दीपावली मनाई जाती है। यह मान्यता हमें सिखाती है कि चाहे अंधकार कितना भी घना हो, धर्म और सत्य की विजय निश्चित है। वहीं, हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर से धन, वैभव और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी का प्राकट्य (जन्म) हुआ था। इसीलिए दीपावली की रात को माता लक्ष्मी के स्वागत और पूजन का विशेष विधान है। लोग अपने घरों के मुख्य द्वार खोलकर रखते हैं और प्रवेश द्वार पर सुंदर रंगोली बनाते हैं, ताकि माता लक्ष्मी उनके घर में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देने पधारें।
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, दीपावली के एक दिन पहले (जिसे नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली कहा जाता है) भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था और उसकी कैद से 16,000 बंदी महिलाओं को मुक्त कराया था। इस क्रूर राक्षस के आतंक से मुक्ति मिलने की खुशी में अगले दिन लोगों ने दीये जलाकर उत्सव मनाया था। यह प्रसंग बुराई के अंत और शोषितों के उद्धार का प्रतीक है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो इसी पावन दिन भारत के महान और न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था। उन्होंने एक नए युग (विक्रम संवत्) की शुरुआत की थी। प्रजा ने अपने प्रिय और लोक-कल्याणकारी राजा के सिंहासन पर बैठने की खुशी में दीप जलाकर पूरे साम्राज्य को रोशन किया था। दीपावली का महत्व केवल सनातन परंपरा तक सीमित नहीं है। जैन धर्म के अनुसार, इसी पावन दिन जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष (निर्वाण) की प्राप्ति हुई थी। वहीं, सिख इतिहास में इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के रूप में बेहद श्रद्धा से मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने ग्वालियर के किले से 52 हिंदू राजाओं को मुगल बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त कराया था और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पहुंचे थे। दीपावली केवल एक दिन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह पूरे पांच दिनों तक चलने वाली एक विस्तृत उत्सव-शृंखला है, जिसमें हर दिन का अपना एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
दीपावली का सामाजिक संदेश भी बेहद गहरा है। यह त्योहार ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के भेद को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरोता है। लोग अपने पुराने मनमुटाव भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। यह अपनों के करीब आने और रिश्तों की डोर को मजबूत करने का समय है। आधुनिक समय में, इस त्योहार को मनाने के तरीकों में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। लोग अब पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं। अत्यधिक शोर और वायु प्रदूषण करने वाले पटाखों की जगह हरित पटाखों वाली दिवाली मनाने पर जोर दिया जा रहा है। मिट्टी के पारंपरिक दीयों का उपयोग फिर से बढ़ रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहता है, बल्कि उन गरीब कुम्हारों के घरों में भी खुशियों का दीया जलता है, जो इन्हें बनाते हैं। दीपावली वास्तव में एक ऐसा त्योहार है, जो हमें बाहर के साथ-साथ अपने भीतर के अंधकार को भी मिटाने की प्रेरणा देता है। हमारे भीतर छिपा हुआ क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार ही असली अंधकार है, जिसे हमें ज्ञान, प्रेम, करुणा और सहानुभूति रूपी दीयों से मिटाना होगा। जब हम समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सकेंगे, तभी हमारी दीपावली सही मायने में सार्थक होगी। आइए, इस दीपावली पर हम प्रतिज्ञा करें कि हम न केवल अपने घर को रोशन करेंगे, बल्कि अपने विचारों को भी सकारात्मक बनाएंगे और पूरे संसार को प्रेम के प्रकाश से सराबोर कर देंगे।
— अजय कुमार
