तुम क्या जानो पढ़ाई
चांदपुर गांव का वह कच्चा मकान, जिसकी छत हर बरसात में टपकती थी, दो उम्मीदों के सहारे टिका हुआ था। एक मां की आंखों की वे नम दुआएं जो वह हर सजदे में मांगती थी, और दूसरा बाप की कमज़ोर हड्डियां जो दिन भर भट्ठे पर ईंटें थापते-थापते पत्थर हो चुकी थीं।
रमज़ान और उसकी पत्नी बिलक़ीस ने अपनी पूरी जिंदगी एक ही सपने की भट्टी में झोंक दी थी,उनका इकलौता बेटा इशहाक वह मुक़ाम हासिल करे जो वे दोनों कभी न कर सके। वह पढ़ेगा, बड़े शहर जाएगा, डॉक्टर बनेगा और इस ग़रीबी के अंधेरे को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देगा।
इशहाक़ जब पहली बार शहर के बड़े कोचिंग संस्थान के लिए रवाना हुआ, तो रमज़ान ने अपनी जेब से वे पांच सौ रुपये निकाले जो उसने दिन-रात की मेहनत-मजदूरी से बचाकर रखे थे। उसने बेटे की हथेली पर पैसे रखते हुए कहा, “बेटा! फ़िक्र मत करना। जब तक तेरा बाप ज़िंदा है, तुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देगा।”
मां-बाप ख़ुद भूखे सो जाते, रातों को फ़िक्र के मारे उनकी नींद उड़ जाती कि उनका बेटा शहर में कैसा होगा, क्या खा रहा होगा। वे हर महीने जोड़-तोड़ करके कोचिंग और कमरे के लिए पैसे भेजते रहते।
लेकिन शहर की चकाचौंध ने इशहाक़ को बहुत जल्द अपनी गिरफ्त में ले लिया। पहले-पहल वह हफ़्ते में दो बार फ़ोन करता था। मां घंटों उससे बातें करती और बाप दूर खड़ा बस बेटे की आवाज सुनकर ही खुश हो जाता। पर वक्त बीतने के साथ इशहाक़ का रवैया बदलने लगा।
कमरे की चार दीवारों में अब किताबें कम और स्मार्टफोन की नीली रोशनी ज़्यादा चमकती थी। दिन भर मोबाइल पर रील्स और गेमिंग की दुनिया में गुम इशहाक़ को यह ख़बर ही न रही कि जिस स्क्रीन को वह सारा दिन उंगलियों से स्क्रॉल करता है, उसे चलाने के लिए उसके बाप की कमर कितनी झुक चुकी है।
जब भी फ़ीस या जेब खर्च के लिए पैसे कम पड़ते, इशहाक़ का एक ही रटा-रटाया जवाब होता, “पैसे भेज दो!”
रमज़ान कभी साहूकार के पास जाता, कभी किसी रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाता और मां अपने हाथों की आखिरी चूड़ियां तक बेचने का सोचने लगती। अगर कभी मां-बाप प्यार से पूछ लेते, “बेटा! पढ़ाई कैसी चल रही है?” तो इशहाक चिढ़कर गुस्सा हो जाता, “तुम क्या जानो पढ़ाई क्या होती है! जब देखो तब टेंशन देते रहते हो।” और फ़ोन काट देता। मां रातों को उठ-उठकर रोती और बाप चुपचाप आसमान को तकता रहता।
कुछ साल यूं ही गुजर गए। आखिर नीट का रिज़ल्ट आ गया।
इशहाक़ घर लौटा, लेकिन उसके चेहरे पर वह चमक नहीं थी। नंबर उतने नहीं आए थे जितने डॉक्टर बनने के लिए चाहिए थे। घर में सन्नाटा छा गया। मां-बाप ग़रीब जरूर थे, लेकिन रमज़ान पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान था। उसने बेटे को ताना नहीं दिया। उसने सोचा कि अगर बेटा डॉक्टर नहीं बन पाया, तो कोई बात नहीं, वह बेटे में अपना अक्स (परछाई) तलाशने लगा। मां भी अपने बच्चे के साथ खड़ी हो गई।
लेकिन रमज़ान की आस अभी पूरी तरह टूटी नहीं थी। उसने अपने बेटे का सपना पूरा करने के लिए एक आख़िरी और खौफ़नाक कदम उठाया।
रमज़ान ने गांव का अपना पुश्तैनी मकान बेच दिया। जीवन भर की जमा-पूंजी और खून-पसीने की कमाई लगा दी। उसने शहर के एक दूर-दराज प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में मैनेजमेंट कोटे की सीट के लिए लाखों रुपये जमा कर दिए। जो कुछ थोड़े-बहुत पैसे बचे, वे बेटे के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए ताकि उसे कोई कमी न हो।
रमज़ान ने बिलक़ीस से कहा, “कोई बात नहीं बिलक़ीस, सिर पर छत न सही, हमारे पास अभी दो एकड़ ज़मीन बची है। हम उसके कोने पर एक छोटी सी झोपड़ी डालकर रह लेंगे। हमारा बेटा जब डॉक्टर बनकर लौटेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”
मकान बिक जाने के बाद रमज़ान पढ़ा-लिखा होकर भी अनपढ़ सा लगने लगा था। उसके फटे-पुराने कपड़े और लाचार शरीर उसकी बेबसी की गवाही देते थे। वह शहर के तौर-तरीक़े नहीं समझ पाता था। इशहाक जब भी बाप को देखता, तो उसे अपने ही अनपढ़ और फ़टेहाल बाप से शर्म आने लगती थी।
अभी कॉलेज शुरू भी नहीं हुआ था कि एक दिन इशहाक़ ने अचानक धमाका कर दिया। उसने दो टूक कह दिया, “मैं शहर नहीं जाऊंगा! मुझे नहीं पढ़ना।”
रमज़ान के पैरों तले जमीन खिसक गई। लाखों रुपये कॉलेज में जमा हो चुके थे। जब रमज़ान भागता हुआ कॉलेज गया, तो उन्होंने साफ़ कह दिया, “पैसे वापस नहीं मिलेंगे। अगर आपका बेटा नहीं पढ़ेगा तो हमारी एक सीट ख़ाली रह जाएगी और हमारा बड़ा नुकसान होगा। इसलिए पढ़ना है तो पढ़ाइए, वरना पैसे भूल जाइए।”
मां और बाप ने गिड़गिड़ाकर इशहाक़ को बहुत समझाया। रमज़ान ने अपने कांपते हाथ जोड़ लिए, पैर तक पकड़ लिए, लेकिन इशहाक़ न जाने किसकी सीख में लगा था या किस जिद्द में ऐंठ गया था,वह पढ़ना ही नहीं चाहता था।
लाखों रुपये पानी में डूब गए।
धीरे-धीरे वक्त का पहिया घुमा और सब कुछ तबाह हो गया। आख़िर में वह दो एकड़ खेत भी बिक गया। बुढ़ापे और लाचारी के कारण अब रमज़ान से मेहनत-मजदूरी भी नहीं होती थी। शरीर जर्जर हो चुका था, इसलिए गांव में अब कोई उसे काम पर भी नहीं बुलाता था। मां-बाप समझा-समझकर लाचार हो चुके थे, और इशहाक बेफ़िक्र होकर अपने मोबाइल में मस्त रहता था।
फ़िर वह एक काली और सर्द रात आई।
आकाश में घना अंधेरा था और हवा में एक अजीब सा सन्नाटा। इशहाक़ रोज की तरह देर रात तक मोबाइल देखता रहा और सो गया।
अगली सुबह जब धूप काफ़ी निकल आई, तो इशहाक़ की आंख खुली। घर में अजीब सी खामोशी फैली थी। न रसोई से बर्तनों की आवाज आ रही थी, न बाहर आंगन में बाप के खांसने की।
इशहाक़ ने अलसाए स्वर में आवाज़ दी, “अम्मां! अब्बा!”
कोई जवाब नहीं आया। उसने उठकर झोपड़ी का कोना-कोना छान मारा, लेकिन मां-बाप कहीं नहीं थे।
तभी उसकी नज़र कमरे की टूटी हुई मेज़ पर पड़ी, जहां उसका मोबाइल रखा था। मोबाइल के नीचे एक लिफ़ाफ़ा दबा हुआ था। इशहाक़ ने आगे बढ़कर लिफाफा खोला। उसके अंदर उसके बैंक अकाउंट की पासबुक और उसकी सभी मार्कशीट रखी थीं।
साथ में एक छोटी सी पर्ची पर रमज़ान की कांपती हुई लिखावट में दो पंक्तियां लिखी थीं,
”बेटा! हमने तुझे आसमान छूने के लिए पंख दिए थे, लेकिन तूने ज़मीन से ही नाता तोड़ लिया। जो खेत और मकान बिके, उनके भी बचे हुए पैसे तेरे अकाउंट में जमा करवा दिए हैं। अब तुझे हमारी जरूरत नहीं है और हमें इस दुनिया से कोई गिला नहीं। हम तेरी ज़िंदगी का वह बोझ थे जो तुझे आगे बढ़ने से रोक रहा था, इसलिए आज हम ख़ुद को तेरे रास्ते से हटा रहे हैं।”
इशहाक़ के हाथ से वह पर्ची छूटकर गिर गई। वह बदहवास होकर बाहर भागा। उसने पूरे गांव में शोर मचाया, पड़ोसियों को इकट्ठा किया। लेकिन किसी को ख़बर नहीं थी कि वे दोनों आधी रात को किस ओर निकल गए।
अगले कई दिनों तक पुलिस, रिश्तेदारों और ग्रामीणों ने आसपास की नदियों, जंगलों और पास के शहरों में चप्पा-चप्पा छान मारा। लेकिन रमज़ान और बिलक़ीस का कहीं कोई सुराग नहीं मिला। वे दोनों ऐसे ग़ायब हुए जैसे ज़मीन निगल गई हो या आसमान खा गया हो।
आज उस वीरान झोपड़ी में इशहाक अकेला बैठता है। उसके बैंक अकाउंट में लाखों रुपये पड़े हैं, लेकिन उन पैसों से रोटी बनाकर खिलाने वाली मां और सिर पर हाथ रखने वाला बाप नहीं है। अब वह रातों को मोबाइल की नीली रोशनी में नहीं, बल्कि अंधेरे में आंखें फाड़े अपने उन मां-बाप की राह तकता है जो उसे ज़िंदगी का सबसे कड़वा सबक़ देकर ऐसी राह पर निकल गए जहां से कोई कभी वापस नहीं लौटता।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
