दिवाली
हर मन में भरपूर बसे खुशहाली, जीवन हो सबका ही समृद्धशाली,
भरने खुशियों से ये झोली खाली, आई है रात अमावस की काली ।
दिव्य शक्ति अर्चन की ये सिद्ध घड़ी, देने इच्छित वर देवी मातु खड़ी,
दसों दिशाओं में फैला अंधेरा, उग्र शक्तियों ने ब्रह्माण्ड को घेरा,
है तपसी सूक्ष्म साधना में खोए, अभिलाषी सुख का नया बीज बोए,
तन-मन को खूबसूरत ही सजाया, “आनंद” अमृत जो चाहा वो पाया,
अष्ट-सिद्धि नव निधियॉं देने वाली, आई है रात अमावस की काली ।
सपना छोड़ चले थे राम अधूरा, हुआ वचन चौदह वर्षों का पूरा,
अयोध्यावासियों ने दुख भुलाया, अवधपुरी को बड़ा सुंदर सजाया,
मंगल गीत खुशी के सबने गाएं, स्वागत में प्रभु के दीप है जगाएं,
तब से पुनीत प्रथा ये चली आई, कार्तिक अमावस दिवाली कहलाई,
यामिनी जगमगाती दीपों वाली, आई है रात अमावस की काली ।
पॉंच-दिवसीय त्यौहार को मनाएं, संग-संग अपना धर्म भी निभाएं,
सभी के सुख-समृद्धि की रख कामना, लक्ष्मी-गणेश की करें आराधना,
जगाएं एक प्रेम का दीप प्यारा, फैलाएं चहुॅं दिश सुख का उजियारा,
निमित्त बन मुस्कान प्यारी खिला दें, चुपके से नई खुशियों से मिला दें,
परमतत्व से सहज जोड़ने वाली, आई है रात अमावस की काली ।
— मोनिका डागा “आनंद”
