हास्य व्यंग्य

त्योहारों में मिठास कम, मिलावट भरती दम!

त्योहार आते ही बाजार में रौनक बढ़ जाती है। मिठाई की दुकानों पर ऐसी सजावट होती है, मानो मिठाइयां नहीं, खुशियों के पैकेट बिक रहे हों। दुकानदार भी ग्राहकों का स्वागत ऐसे करते हैं जैसे बरसों से उनकी सेहत की चिंता में दुबले हुए जा रहे हों। लेकिन इस मिठास के पीछे मिलावट का जो कड़वा सच छिपा है, वह किसी से छिपा नहीं है।

पहले त्योहारों पर घरों में मावे की मिठाइयां बनती थीं। अब जमाना बदल गया है। घर में मिठाई बनाने की फुर्सत किसे है? बाजार में सब कुछ रेडीमेड उपलब्ध है। बस जेब में पैसा और दुकानदार पर भरोसा होना चाहिए। हालांकि भरोसे का बाजार भी अब मिलावट की गिरफ्त में है।

मजे की बात यह है कि मिठाई खरीदते समय ग्राहक शुद्धता की गारंटी मांगता है और दुकानदार मुस्कुराकर कहता है, बिल्कुल शुद्ध है! बेचारा ग्राहक भी उसकी बात पर भरोसा कर लेता है। उसे क्या मालूम कि मिठाई में मावे से ज्यादा मिलावट का अनुभव घुला हुआ है। कहीं दूध में पानी, कहीं घी में दूसरा तेल और कहीं पनीर में ऐसी सामग्री कि प्रयोगशाला भी सोच में पड़ जाए।

सरकारी विभाग भी त्योहारों से पहले अचानक जाग उठते हैं। छापेमारी होती है, नमूने लिए जाते हैं, मिलावटी सामान पकड़ा जाता है और अखबारों में बड़ी-बड़ी खबरें छप जाती हैं। जनता खुश हो जाती है कि अब मिठाइयां शुद्ध मिलेंगी। लेकिन त्योहार बीतते ही यह अभियान भी सरकारी फाइलों में मिठास घोलने चला जाता है। साथ ही जीभ भी लपालप हो जाती हैं।

सवाल यह है कि जब हर साल मिलावट पकड़ी जाती है, तो मिलावटखोरों का कारोबार बंद क्यों नहीं होता? आखिर कानून की सख्ती दुकानदारों तक पहुंचते-पहुंचते इतनी नरम कैसे पड़ जाती है?

त्योहार खुशियां बांटने के लिए हैं, बीमारियां बांटने के लिए नहीं। सरकार को भी चाहिए कि मिठाई में मिठास और व्यवस्था में सख्ती रखे। वरना आने वाले समय में लोग मिठाई खाने से पहले स्वाद नहीं, उसकी प्रयोगशाला रिपोर्ट पूछेंगे!

— संजय एम तराणेकर

संजय एम. तराणेकर

जन्म वर्ष 1968 कवि, स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार। शिक्षा स्नातक एवं गायन में 1986 में विद् किया होकर केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद् द्वारा हिन्दी आषुलिपि प्रतियोगिता में वर्ष 1992 प्रषस्ति-पत्र प्राप्त। विशेष रूचि-बॉलीवुड फिल्में एवं संगीत, पुस्तक समीक्षा एवं राजनीति। मैं मूलतः मध्य प्रदेश के स्वच्छता में हैट्रिक लगा चुके एवं चार बार नंबर वन बनें स्मार्ट सिटी इन्दौर का निवासी हूँ। 1990 के दशक में लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी प्रारंभिक शुरूआत की। लेखकीय सुकून कितना संतोष देता है, इसकी बात ही कुछ और है। युवा होने पर फिल्मी कलाकारों की तरफ झुकाव ने फिल्मों पर आलेख लिखने की प्रेरणा दी। इसमें मेरी रूचि भी थी। विशेषकर पुराने फिल्मी कलाकारों के जीवन से सम्बंधित आलेखों पर अधिक ध्यान आकर्षित रहा। बावजूद इसके लघु कथा व कविता (बतौर युवा कवि आकाशवाणी इन्दौर में कविता पाठ के भी कई अवसर प्राप्त हुए है।) के अलावा सामयिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों पर समय-समय पर अपनी लेखनी को आयाम देने के प्रयास आज भी अनवरत हैं। अब तक विभिन्न समाचार-पत्रों में मुख्य रूप से बॉलीवुड/सिनेमा की साप्ताहिक मेगजीनों में आलेखों एवं पुस्तक समीक्षाओं का प्रकाशन हो चुका है। इनमें ‘लोकमत समाचार-आकर्षण व शो टाईम, राजस्थान पत्रिका-बॉलीवुड, पंजाब केसरी व दैनिक ट्रिब्यून के मनोरंजन, राज एक्सप्रेस-राज सिनेमा, द सी एक्सप्रेस-सी सिनेमा, हरि-भूमि के रंगारंग व रविवार भारती, चौथा संसार के बॉलीवुड, बीपीएन टाईम्स के शो बीपीएन व तरंग, लोकदशा के पर्दा-बेपर्दा व विविधा, नव-भारत एवं स्वतंत्र भारत के अलावा कई स्थानीय समाचार-पत्रों में भी आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। वहीं ‘स्वतंत्र वार्ता एवं डेली हिन्दी मिलाप‘ में कई वर्षो तक नियमित रूप से लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 31, संजय नगर, इन्दौर-452011 मध्य प्रदेश, (वार्ता+वाट्स एप) 98260.25986 ईमेलः s.taranekar@rediffmail.com, Facebook – https://www.facebook.com/Taranekar9

Leave a Reply