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रूप-सौन्दर्य चाहिए तो मन बुहारें, तन सँवारें!

मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षाओं में सुंदर दिखने की चाहत का अपना विशिष्ट स्थान है। आकर्षक व्यक्तित्व, सुघड़ वेशभूषा और सौम्य चेहरा सहज ही लोगों का ध्यान खींचते हैं। यही कारण है कि हम अपने रूप-रंग को सँवारने के लिए समय, श्रम और धन खर्च करने में पीछे नहीं रहते। सौन्दर्य प्रसाधनों से लेकर महँगे उपचारों और ब्यूटी पार्लरों तक, बाहरी आकर्षण बढ़ाने के लिए आज असंख्य साधन उपलब्ध हैं। मगर इस आपाधापी में एक बुनियादी प्रश्न कहीं पीछे छूट गया हैकृक्या सुंदर दिखना ही सुंदर होना है?

सौन्दर्य केवल चेहरे की बनावट, त्वचा की चमक या शारीरिक आकर्षण का नाम नहीं है। उसका एक पक्ष आँखों से दिखाई देता है, तो दूसरा व्यवहार, विचार और संस्कारों में अनुभव किया जाता है। बाहरी रूप पहली दृष्टि में आकर्षित कर सकता है, लेकिन मन की सुंदरता ही किसी व्यक्ति के प्रति स्थायी सम्मान और आत्मीयता पैदा करती है। चेहरा कुछ क्षणों के लिए प्रभावित करता है, जबकि चरित्र जीवन भर अपनी पहचान बनाए रखता है।

रूप चौदस – तन की स्वच्छता के साथ मन की सफाई का पर्व

दीपावली के पंचपर्वों में रूप चौदस का विशेष महत्त्व है। इसे नरक चतुर्दशी और छोटी दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। परंपरागत रूप से यह दिन शारीरिक स्वच्छता, उबटन, स्नान और रूप-निखार से जुड़ा रहा है। इस अवसर पर तन को स्वच्छ और सुंदर बनाने की परंपरा के पीछे केवल आकर्षक दिखने की कामना नहीं, बल्कि स्वच्छता, स्वास्थ्य और आत्मसंवार का भाव भी निहित है।

पुराने समय में रूप निखारने के लिए प्रकृति ही सबसे बड़ी सौन्दर्यशाला हुआ करती थी। घर-आँगन और आसपास के परिवेश में उपलब्ध हल्दी, चंदन, बेसन, उबटन, मुल्तानी मिट्टी तथा विभिन्न वनस्पतियों का उपयोग परंपरागत रूप से स्नान और त्वचा की देखभाल में किया जाता था। प्रकृति के निकट जीवन, शारीरिक श्रम, संतुलित आहार और स्वच्छ दिनचर्या भी सहज रूप से व्यक्तित्व को निखारने में योगदान देते थे।

आज स्थिति बदल गई है। सौन्दर्य का संसार विशाल बाजार में बदल चुका है। आकर्षक पैकिंग, विज्ञापन और त्वरित परिणामों के दावों ने हमारी सौन्दर्य संबंधी धारणाओं को प्रभावित किया है। बाजार हमें बार-बार यह विश्वास दिलाता है कि सुंदर दिखने के लिए कोई नया उत्पाद, कोई विशेष उपचार या कोई महँगा प्रसाधन अनिवार्य है। परिणाम यह है कि हम अपने स्वाभाविक रूप को स्वीकार करने के बजाय उसे लगातार बदलने की दौड़ में शामिल होते जा रहे हैं।

सौन्दर्य प्रसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उनका अंधानुकरण और बाहरी दिखावे के प्रति अतिशय आसक्ति निश्चित रूप से विचारणीय है। त्वचा की देखभाल के नाम पर अनजाने रसायनों का प्रयोग, बिना जानकारी के उपचार और क्षणिक आकर्षण के लिए स्वास्थ्य की अनदेखी करना उचित नहीं। प्रकृति की ओर लौटने का अर्थ आधुनिक सुविधाओं को नकारना नहीं, बल्कि विवेक और संतुलन के साथ उनका उपयोग करना है।

चेहरे की चमक से पहले चित्त की निर्मलता जरूरी

हम अक्सर अपने चेहरे पर जमी धूल-मिट्टी साफ करने के लिए तो तत्पर रहते हैं, लेकिन मन में जमा ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, छल, कपट और स्वार्थ की परतों को हटाने की ओर ध्यान नहीं देते। तन की स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान करते हैं, लेकिन विचारों की स्वच्छता के लिए कितनी बार आत्मनिरीक्षण करते हैं?

जिस मन में दूसरों के प्रति दुर्भावना हो, व्यवहार में छल-कपट हो, वाणी में कटुता हो और कर्मों में स्वार्थ का बोलबाला हो, वहाँ बाहरी सजावट व्यक्तित्व को आकर्षक तो बना सकती है, किंतु उसे सुंदर नहीं बना सकती। महँगे वस्त्र, चमकता चेहरा और सुसज्जित व्यक्तित्व किसी के भीतर की संवेदनहीनता, कुटिलता अथवा अहंकार को छिपा नहीं सकते। कृत्रिम आवरण कुछ समय तक भ्रम पैदा कर सकता है, लेकिन व्यवहार की सच्चाई अंततः सामने आ ही जाती है।

आज हमारी सामाजिक विडम्बना यह भी है कि हम वास्तविक व्यक्तित्व से अधिक उसकी प्रस्तुति पर ध्यान देने लगे हैं। हम जैसे हैं, उससे अधिक अच्छा दिखाई देने की चिंता हमें घेरे रहती है। सामाजिक जीवन हो या सार्वजनिक व्यवहार, अनेक बार छवि को चरित्र से अधिक महत्त्व दिया जाने लगता है। दिखावे की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे व्यक्ति को अपनी मौलिकता से दूर कर देती है। वह दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को प्रस्तुत करने में इतना व्यस्त हो जाता है कि अपने वास्तविक व्यक्तित्व और आत्मसंतोष से ही दूर हो बैठता है।

मन का सौन्दर्य ही व्यक्तित्व की वास्तविक आभा है

वास्तविक सौन्दर्य उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में दिखाई देता है, जिसके विचारों में पवित्रता, व्यवहार में विनम्रता, वाणी में मधुरता और कर्मों में उदारता हो। जो दूसरों के दुःख को समझता है, जरूरतमंद की सहायता करता है, अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करता है और विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय मूल्यों से समझौता नहीं करताकृउसके व्यक्तित्व में एक ऐसी आभा होती है, जिसे किसी प्रसाधन या कृत्रिम सजावट से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

मन की निर्मलता चेहरे पर भी सहजता, शांति और आत्मविश्वास के रूप में झलकती है। ऐसा सौन्दर्य उम्र, रंग, शारीरिक बनावट या किसी बाहरी मानक का मोहताज नहीं होता। यह व्यक्ति के संस्कारों और जीवन-दृष्टि से उपजता है। यही वह आकर्षण है जो लोगों को केवल प्रभावित नहीं करता, बल्कि प्रेरित भी करता है।

रूप चौदस का पर्व हमें इसी व्यापक अर्थ में स्वयं को सँवारने की प्रेरणा दे सकता है। इस दिन तन को स्वच्छ करने के साथ मन के भीतर झाँकने का भी संकल्प लें। अपने विचारों से ईर्ष्या और द्वेष हटाएँ, व्यवहार से छल-कपट दूर करें, वाणी से कटुता कम करें और कर्मों में सेवा, सहयोग तथा संवेदना का भाव विकसित करें। घर-आँगन की सफाई के साथ अपने मन के कोनों में जमा विकारों की भी सफाई करें।

आइए, इस रूप चौदस पर केवल चेहरे का रूप निखारने तक सीमित न रहें। अपने भीतर की सुंदरता को पहचानें, मौलिकता को अपनाएँ और मानवीय मूल्यों को जीवन का आधार बनाएँ। क्योंकि तन का सौन्दर्य समय के साथ बदल सकता है, लेकिन मन की सुंदरता व्यक्ति को हर समय आकर्षक बनाए रखती है।

याद रखिए, चेहरे को सँवारने के लिए दर्पण चाहिए, लेकिन व्यक्तित्व को निखारने के लिए आत्मदर्शन जरूरी है। इसलिए रूप-सौन्दर्य चाहिए तो तन के साथ मन भी बुहारें।

सभी को रूप चौदस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

— डॉ. दीपक आचार्य

*डॉ. दीपक आचार्य

M-9413306077 dr.deepakaacharya@gmail.com

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