शहर की सड़कें किसकी हैं—आयोजनों की या आम आदमी की?
एक पिता सड़क पर हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा और एंबुलेंस में उसका बेटा जिंदगी की आखिरी सांसें गिनता रहा। इससे बड़ी संवेदनहीनता क्या होगी! कानपुर में 22 वर्षीय सिपाही प्रांशु सचान को लेकर जा रही एंबुलेंस राजनीतिक रैली के जाम में फंस गई। पिता पुलिस और राहगीरों से गुहार लगाते रहे, लेकिन रास्ता नहीं खुला। टाटमिल चौराहे पर करीब डेढ़ घंटे जाम में फंसने के बाद कुल करीब तीन घंटे में एंबुलेंस अस्पताल पहुंची, तब तक प्रांशु दम तोड़ चुका था। एक युवा जिंदगी इसलिए नहीं बच सकी, क्योंकि सड़क पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन को एंबुलेंस के रास्ते से अधिक तरजीह मिली। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, हर शहर की उस व्यवस्था पर तमाचा है, जहां सड़कें आवागमन से अधिक अतिक्रमण, भीड़ और प्रदर्शनों की भेंट चढ़ रही हैं।
सड़क दुर्घटना के बाद शुरुआती एक घंटा यानी ‘गोल्डन ऑवर’ जीवन बचाने के लिए निर्णायक होता है। लेकिन हमारे शहरों में यह कीमती समय अस्पताल पहुंचने के बजाय जाम में बीत जाता है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रोड ऐक्सिडेंट्स इन इंडिया 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में देश में 4,87,707 सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1,77,175 लोगों की मौत हुई। यानी प्रतिदिन करीब 485 लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी संसद में समय पर उपचार न मिलने को इन मौतों का बड़ा कारण बता चुके हैं। सवाल है कि जब हर मिनट जिंदगी बचा सकता है, तो हमारी सड़कें एंबुलेंस का रास्ता घंटों तक क्यों रोकती हैं?
दिवाली आते ही शहरों की सड़कों पर अराजकता बढ़ जाती है। दुकानों का सामान फुटपाथों से निकलकर सड़क तक फैल जाता है। ठेले, खोमचे और अस्थायी दुकानें रास्ता घेर लेते हैं। ग्राहक भी सड़क किनारे वाहन खड़े कर खरीदारी करने लगते हैं। नतीजतन, आधी सड़क कारोबार और बाकी बेतरतीब पार्किंग की भेंट चढ़ जाती है। पैदल यात्रियों को वाहनों के बीच से गुजरना पड़ता है। यही हाल कानपुर, दिल्ली, लखनऊ, मुंबई, हैदराबाद, अमृतसर और इंदौर समेत छोटे-बड़े शहरों का है। बाजार सजाने और कारोबार बढ़ाने की होड़ में कोई नहीं सोचता कि एंबुलेंस के लिए रास्ता खुला रहना भी जरूरी है। प्रशासन भी अक्सर त्योहारों के बाद अतिक्रमण हटाने की औपचारिकता निभाता है, जबकि रास्ते पहले से खाली रखना जरूरी है।
धार्मिक जुलूसों, बारातों और राजनीतिक रैलियों के कारण यह अव्यवस्था और गहराती है। इनके चलते कई बार सड़कें घंटों तक ठप रहती हैं। भीड़ जुटाने, मंच लगाने और पार्किंग के इंतजाम होते हैं, लेकिन एंबुलेंस के लिए रास्ता छोड़ने की चिंता नहीं होती। हाल ही में दिल्ली में एक रैली के कारण 20-25 प्रमुख बाजारों की करीब 2.5 लाख दुकानें बंद रहने और 10-11 हजार करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होने का दावा चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष ने किया। यह स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यापारियों का अनुमान है। फिर भी इससे आयोजनों के कारण जनजीवन और कारोबार पर पड़ने वाला असर स्पष्ट होता है। जब बाजारों का कारोबार ठप हो सकता है, तो मरीजों की जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।
समस्या की गंभीरता दिल्ली के एक अभियान से स्पष्ट होती है। जून 2026 में दिल्ली यातायात पुलिस और नगर निगम ने अतिक्रमण व अवैध पार्किंग के खिलाफ 55,532 चालान काटे और 3,123 वाहन जब्त किए। 144 स्थानों से 1,264 रेहड़ी-पटरी अतिक्रमण और 1,015 अन्य अवैध कब्जे हटाए। कर्नाटक में कैग की एक पुरानी (2022) रिपोर्ट के अनुसार, करीब 90 हजार दुर्घटना मामलों में एंबुलेंस की देरी या दूर तैनाती से पीड़ितों को समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिली। लगभग छह हजार मामलों में एंबुलेंस भेजने में 30 मिनट से अधिक लगे। ये आंकड़े प्रशासनिक निगरानी, आपातकालीन सेवाओं और नागरिक अनुशासन की साझा विफलता उजागर करते हैं।
विडंबना है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अगस्त 2026 में राजमार्गों पर एंबुलेंस की जवाबदेही तय करने के लिए नए मानक लागू किए। इनके अनुसार, 10 किलोमीटर के दायरे में एंबुलेंस को 10 मिनट में दुर्घटनास्थल और घायल को एक घंटे में निकटतम अस्पताल पहुंचाना अनिवार्य है। देरी पर 10 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 194ई के तहत एंबुलेंस को रास्ता न देने पर भी 10 हजार रुपये जुर्माना लग सकता है। सवाल है कि राजमार्गों पर समय-सीमा तय हो सकती है, तो शहरों में क्यों नहीं? 108 जैसी सेवाएँ भी तभी कारगर हैं, जब एंबुलेंस को रास्ता मिले। अस्पताल पहुंचने से पहले मरीज दम तोड़ दे, तो आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षित कर्मचारी भी बेकार हैं।
अब खोखले आश्वासनों के बजाय सख्त कार्रवाई जरूरी है। दिवाली और अन्य त्योहारों पर अतिक्रमण रोकने के लिए पहले से यातायात योजना बने। अवैध पार्किंग पर तत्काल जुर्माना और वाहन जब्त हों। धार्मिक जुलूसों व राजनीतिक रैलियों के लिए वैकल्पिक मार्ग, निश्चित समय और अलग पार्किंग अनिवार्य हो। अनुमति देने से पहले प्रशासन सुनिश्चित करे कि आपातकालीन गलियारा हर हाल में खुला रहेगा। प्रमुख चौराहों पर एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर, स्मार्ट सिग्नल और जीपीएस निगरानी हो। जाम में एंबुलेंस फंसने की हर गंभीर घटना की जांच हो और लापरवाही पर अधिकारियों व आयोजकों की जवाबदेही तय हो। नागरिक भी समझें कि सायरन सुनकर रास्ता देना एहसान नहीं, कानूनी और मानवीय जिम्मेदारी है।
कानपुर की घटना का सबसे पीड़ादायक पहलू यह है कि एक पिता बेटे को बचाने के लिए हाथ जोड़ता रहा, लेकिन पूरा शहर उसे रास्ता नहीं दे सका। प्रांशु की मौत के बाद रैलियां खत्म हो जाएंगी, बाजार फिर सजेंगे और जुलूस निकलेंगे, लेकिन उस पिता के जीवन का खालीपन कोई मुआवजा या सरकारी आश्वासन नहीं भर सकेगा। लोकतंत्र, धर्म, व्यापार और उत्सव का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है, उसे संकट में डालना नहीं। जिस शहर में एंबुलेंस को रास्ता मांगना पड़े और जिंदगियां जाम में दम तोड़ें, वहां विकास के दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। सड़कें किसी दल की शक्ति दिखाने, दुकान का कारोबार बढ़ाने या आयोजनों की भीड़ जुटाने के लिए नहीं, सबसे पहले जिंदगियां बचाने के लिए हैं। जिस दिन यह बात नागरिकों और प्रशासन की प्राथमिकता बनेगी, उसी दिन शहर वास्तव में रहने लायक बनेंगे।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
