मृतात्माएँ भी करती हैं दीपावली का इंतजार !
वागड़ की अनूठी लोकपरंपरा ‘दीवड़ा’,
दीपावली का पर्व केवल जीवित मनुष्यों के उल्लास, उमंग और उत्सव का अवसर नहीं है। भारतीय लोकजीवन की कुछ ऐसी परंपराएँ भी हैं, जिनमें इस प्रकाश पर्व को दिवंगत परिजनों के स्मरण और उनके कल्याण की कामना से जोड़ा गया है।
राजस्थान के वागड़ अंचल में प्रचलित ‘दीवड़ा’ ऐसी ही एक अनूठी लोकधार्मिक रस्म है, जिसमें दीपावली की अलसुबह यमराज और पितरों के निमित्त दीपदान कर परिवार में वर्षभर के दौरान दिवंगत हुए सदस्यों के लिए गति-मुक्तिदायी मंगलकामना की जाती है।
वागड़ की इस परंपरा में मानो दीपावली का उजाला केवल घर-आँगन और संसार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे परलोक में विद्यमान माने गए पितरों तक पहुँचाने की भावना भी जुड़ी हुई है। लोकविश्वास है कि दिवंगत आत्माएँ भी इस उजाले की प्रतीक्षा करती हैं और उनके निमित्त किया गया दीपदान उनके कल्याण का माध्यम बनता है। यही कारण है कि यहाँ दीपावली के उल्लास में दिवंगतों का स्मरण भी एक विशेष धार्मिक विधान के रूप में शामिल है।
‘दीवड़ा’ – दिवंगतों के लिए प्रकाश का अनुष्ठान
वागड़ अंचल में दीपावली के अवसर पर होने वाली इस रस्म को ‘दीवड़ा’ कहा जाता है। यह आयोजन सामान्यतः रूप चतुर्दशी की रात्रि के अंतिम प्रहर में, दीपावली के दिन तड़के लगभग चार से पाँच बजे के बीच किया जाता है। परिवार में बीते एक वर्ष के दौरान जिन परिजनों का निधन हुआ हो, उनके निमित्त यह विधान सम्पन्न किया जाता है। इसमें यमराज और पितरों को दीप अर्पित कर दिवंगत आत्मा के कल्याण, तेज और सद्गति की कामना की जाती है।
इस परंपरा के साथ एक विशेष लोकमान्यता भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि दिवंगत के निमित्त दीवड़ा न किए जाने अथवा विधि-विधान में कमी रह जाने पर उस जीवात्मा को अगले जन्म में दृष्टिदोष या अंधत्व का कष्ट भोगना पड़ सकता है। इसी विश्वास के चलते इस अनुष्ठान में दीपदान को विशेष महत्त्व दिया जाता है। यह मान्यता लोकपरंपरा का हिस्सा है; इसका आशय इस रस्म के माध्यम से दिवंगत परिजन के प्रति परिवार की श्रद्धा और मंगलकामना को व्यक्त करना है।
जलाशय के किनारे होता है सामूहिक आयोजन
दीवड़ा की रस्म प्रायः गाँव, कस्बे अथवा नगर की आबादी से बाहर किसी जलाशय के किनारे सम्पन्न की जाती है। लोकविश्वास में जलाशयों और उनके आसपास के पवित्र स्थलों को पितृस्मरण तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्त्व प्राप्त है। जिन परिवारों में वर्षभर के दौरान किसी परिजन का निधन हुआ हो, उनके सदस्य इस आयोजन में सम्मिलित होते हैं। मृतक के निकट संबंधियों और परिवार के अन्य सदस्यों की सहभागिता भी इसमें रहती है।
परिजन स्नान करके अनुष्ठान स्थल पर पहुँचते हैं अथवा वहाँ पहुँचकर स्नान करते हैं। संकल्प के समय दिवंगत व्यक्ति का नाम और गोत्र उच्चारित किया जाता है। उसके कल्याण, तेज तथा दृष्टिदोष निवारण की कामना की जाती है। साथ ही पूर्वजों और वंशपरंपरा के पितरों का भी स्मरण किया जाता है। इस प्रकार यह आयोजन केवल हाल ही में दिवंगत हुए परिजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार की समूची पितृपरंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर बन जाता है।
सुपारी, पाषाणखण्ड और षोडशोपचार पूजा का विधान
दीवड़ा अनुष्ठान में सुपारी अथवा पाषाण खंड को प्रतीक मानकर भगवान विष्णु का आवाहन किया जाता है। इसके बाद न्यास, ध्यान और षोडशोपचार विधि से पूजन सम्पन्न किया जाता है। अनुष्ठान में तीन सुपारियों के माध्यम से यमराज और पितरों का आवाहन करने की परंपरा भी प्रचलित है। इनके निमित्त तीन घृतदीप प्रज्वलित किए जाते हैं और यम तथा पितरों से संबंधित मंत्रों के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
इस पूजा में नई फसल और ताजी सामग्री का विशेष महत्त्व है। कलश अथवा मिट्टी के छोटे पात्र में, जिसे वागड़ की स्थानीय बोली में ‘सउड़ी’ कहा जाता है, नवान्न के रूप में सूखे पोहे भरे जाते हैं। कुछ स्थानों पर चने भी रखे जाते हैं। इसके साथ फल आदि अर्पित किए जाते हैं। नई उपज का समर्पण प्रकृति, कृषि और जीवन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी माना जा सकता है।
गन्ने के ध्वजदंड और पितरों के लिए डागरा
दीवड़ा की एक विशेष पहचान इसमें लगाए जाने वाले रंगीन ध्वज भी हैं। लाल और पीले रंग के ध्वजों के लिए प्रायः गन्ने के टुकड़ों को ध्वजदंड के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। दीपावली के आसपास गन्ने की फसल उपलब्ध होने के कारण इसके उपयोग की परंपरा विकसित हुई। कुछ स्थानों पर स्थानीय रूप से उपलब्ध अन्य वनस्पतियों और लकड़ियों का भी प्रयोग किया जाता है। ध्वज, दीप और नवान्न के माध्यम से पूजा में नवीनता, समृद्धि और मंगलभाव का समावेश होता है।
वागड़ के कुछ समाजों में इस अनुष्ठान के दौरान पितरों के लिए लकड़ी और कपड़े के टुकड़ों से एक छोटा मचान बनाया जाता है, जिसे स्थानीय रूप से ‘डागरा’ कहा जाता है। इस पर पितरों को विराजमान कराने की भावना की जाती है। यह विधान अपने पूर्वजों को सम्मानपूर्वक स्मरण करने और उन्हें परिवार की परंपरा में स्थान देने का प्रतीक है।
यमराज और पितरों का पूजन, दीपदान तथा भगवान विष्णु की आराधना पूरी होने के बाद आरती की जाती है और विधिपूर्वक आवाहित देवताओं एवं पितरों का विसर्जन किया जाता है। इस संपूर्ण पूजा-विधान को संबंधित समाजों के गोरजी अथवा परंपरागत कर्मकांड के जानकार पंडित सम्पन्न कराते हैं।
दीवड़ा के बाद भी जारी रहता है पितृस्मरण
दीवड़ा की रस्म पूरी होने के बाद परिजन पुनः स्नान-ध्यान करते हैं और देवदर्शन आदि करते हैं। दीपावली के दिन दिवंगत परिजन के घर में उनका विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। ब्राह्मणों तथा सगे-संबंधियों को भोजन कराने की परंपरा भी कई परिवारों में प्रचलित है। भोजन में बरफी, लडडू-बाटी, दाल-बाटी, दूध, खीर और अन्य मिष्ठान्न आदि का नैवेद्य तैयार किया जाता है। इस प्रकार दीपदान से आरम्भ हुआ पितृस्मरण अन्नदान, आतिथ्य और पारिवारिक सहभागिता के रूप में आगे बढ़ता है।
देव दीपावली पर भी होता है दीवड़ा
जिन परिवारों में दीपावली के आसपास किसी परिजन का निधन हो जाता है, उनके लिए दीवड़ा का आयोजन देव दीपावली के अवसर पर किया जाता है। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी के अंतिम प्रहर में, अर्थात् देव दीपावली की अलसुबह, उसी प्रकार का पूजा-विधान सम्पन्न किया जाता है। इसमें भी यमराज और पितरों का आवाहन, दीपदान, नवान्न अर्पण तथा दिवंगत के कल्याण की कामना की जाती है।
लोकसंस्कृति में जीवित है पितरों के प्रति कृतज्ञता का भाव
काशी और अन्य प्राचीन तीर्थक्षेत्रों की तरह वागड़ अंचल में भी धर्म, अध्यात्म और लोकविश्वासों का गहरा प्रभाव जनजीवन में दिखाई देता है। यहाँ की अनेक परंपराएँ शास्त्रीय मान्यताओं और स्थानीय लोकाचार के समन्वय से विकसित हुई हैं। ‘दीवड़ा’ भी इसी सांस्कृतिक विरासत का एक विशिष्ट उदाहरण है।
आधुनिक समय में जब त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और उत्सवों का बड़ा हिस्सा बाजार तथा बाहरी चकाचौंध तक सिमटता जा रहा है, तब दीवड़ा जैसी परंपराएँ हमें अपने पूर्वजों, पारिवारिक जड़ों और सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ती हैं। यह रस्म केवल दीप जलाने का कर्मकांड नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीयता व्यक्त करने का अवसर है, जो भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन परिवार की स्मृतियों और संस्कारों में आज भी जीवित हैं।
वागड़ की यह अनूठी लोकपरंपरा मानो कहती है कि दीपावली का प्रकाश केवल अपने लिए नहीं, उन अपनों की स्मृति के लिए भी होना चाहिए, जिनके साथ कभी हमारा जीवन आलोकित हुआ करता था। यही इस पर्व की व्यापक संवेदना है- अँधेरे को दूर करना, स्मृतियों को सम्मान देना और अपने अस्तित्व की जड़ों के प्रति कृतज्ञ बने रहना। दीपावली का उजाला जब दिवंगतों की स्मृति में भी जल उठे, तब वह केवल घरों का नहीं, पीढ़ियों के रिश्तों का पर्व बन जाता है।
— डॉ. दीपक आचार्य
