कविता

ऊबड़-खाबड़ रास्ते

इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया

उठकर गिरना और फिर गिरकर उठना सिखा दिया

इन रास्तों पर बहुत बार गिरी हूँ मैं,

इन रास्तों ने फिर गिरकर सँभलना सिखा दिया

इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।

 

कदमों को बढ़ना और बढ़कर रुकना सिखा दिया

सूरज के साथ उगना और उसी के साथ ढलना सिखा दिया

परिस्थितियाँ चाहें जैसी भी हों

इन्होंने बरसात में भीगना और धूप में जलना सिखा दिया

इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।

 

दूरियों से छलना फिर दूरियों को छलना सिखा दिया

राहों को जीवन और जीवन को राहों में बदलना सिखा दिया

चोट चाहें जैसी भी लगी हो यहाँ

जीवन के हर दर्द पर मलहम मलना सिखा दिया

इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।

 

राह पार कर उसे मंज़िल में बदलना सिखा दिया

हर साँस अपनी देके, नई साँस को पलना सिखा दिया

दुनिया की राह में स्वयं को

फूल बनके खिलना और फल बनके फलना सिखा दिया

इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।

*****

 

*नीतू सिंह

नाम नीतू सिंह ‘रेणुका’ जन्मतिथि 30 जून 1984 साहित्यिक उपलब्धि विश्व हिन्दी सचिवालय, मारिशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी कविता प्रतियोगिता 2011 में प्रथम पुरस्कार। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, कविता इत्यादि का प्रकाशन। प्रकाशित रचनाएं ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013) ‘समुद्र की रेत’ नामक कहानी संग्रह(प्रकाशन वर्ष - 2016), 'मन का मनका फेर' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2017) तथा 'क्योंकि मैं औरत हूँ?' नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) तथा 'सात दिन की माँ तथा अन्य कहानियाँ' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) प्रकाशित। रूचि लिखना और पढ़ना ई-मेल n30061984@gmail.com

4 thoughts on “ऊबड़-खाबड़ रास्ते

  • लीला तिवानी

    प्रिय सखी नीतू जी, सच है, हम सीखना चाहें, तो ये ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं.

    • नीतू सिंह

      जी सही है।

  • नीतू सिंह

    शुक्रिया

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता, नीतू जी !

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