बे वजह ही पतिंगे सब मारे गए
शाम को यूँ लगा सामत आ गयी
देखते देखते बदली सी छा गयी
चमकी विजलियां गर्जना खूब हुई
सोंच शैलाब को लर्जना खूब हुई
न हम तैयार थे न था मौसम कोई
बेवक्त ही कोई बरखा आ गयी
तेज खूब पूर्वा हुई झूम शजरें गईं
इस अचम्भे की दूर तक खबरें गईं
जुगनुओं की चमक नज़र आने लगी
रिमझीम जब हुई सांझ सी छा गयी
छाई काली घटा छिप सितारे गए
बे वजह ही पतिंगे सब मारे गए
समझ के गए कि दिया जल रहा
जलती मसालें सामने आ गयी
भवंर से थे वाकिफ वो साहिल पे थे
जो बहे बहाव में वो जाहिल ही थे
दूरदर्शन का (राज) अभी भी सही
चाहते जो रहे वो सब पा गए
राजकुमार तिवारी (राज)
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
