गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ज़ुल्म से भिड़ती नहीं है गर कलम।
कर रही है सिर्फ़ हस्ताक्षर कलम।

दर्द की आवाज़ यदि बनती नहीं,
मान लीजे है महज़ पत्थर कलम।

ज़ख़्म पर मरहम लगाती है कभी,
तो कभी ख़ुद ही हुई नश्तर कलम।

इश्क़ ने शायद रुलाया है बहुत,
है तभी तो आँसुओं से तर कलम।

घेरने लगती उदासी जब कभी,
थाम लेती है मुझे आकर कलम।

हो विवादों की अगर संभावना,
साधती है ख़ामुशी अक्सर कलम।

दूसरों के वास्ते कुछ हो न हो,
है सुख़नवर के लिए ज़ेवर कलम।

— बृज राज किशोर ‘राहगीर’

बृज राज किशोर "राहगीर"

वरिष्ठ कवि, पचास वर्षों का लेखन, दो काव्य संग्रह प्रकाशित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं एवं साझा संकलनों में रचनायें प्रकाशित कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ सेवानिवृत्त एलआईसी अधिकारी पता: FT-10, ईशा अपार्टमेंट, रूड़की रोड, मेरठ-250001 (उ.प्र.)