सनातन का मत करो तिरस्कार
सनातनी होकर सनातनी का तिरस्कार
ऐसे अधर्मी को है हिन्द का धिक्कार
खतियान पलटा कर पढ़ लो रे नादान
तेरे पूर्वज भी थे सिन्ध के सन्तान
तुष्टीकरण की हो रही नीच सियासत
अपने अन्दर झाँको जहाँ हिन्द है विरासत
मत बिछाओ गलत राजनीति की बिसात
आते जाते रहती है जग में सत्ता दिन रात
अपने का वजूद तुम नहीं है आज पहचाना
कुरसी पाने के लिये तुम बन रहे हो बेगाना
काजल की कोठरी है ये सत्ता की गलियारा
बेईज्जती व अपमान की निकला है सितारा
श्रीराम जी श्रीकृष्ण जी की है ये पावन धरती
गौतम महावीर शिवा जी की सजी है मूरति
मष्तक पे मत लगाओ कलंक का वो टीका
धर्म मिट गया तो सम्मान हो जायेगा फीका
गर धर्म गया तो लुट जायेगा जीवन की कमाई
त्रिशंकू जैसा अंबर में लटक जायेगा तूँ साईं
ना घर का ना घाट का रहेगा जगत में गद्दार
थुकेगा तुम पर आने वाले पीढ़ी की संसार
भूल गया तुम वो गुलामी की यातना व पीड़ा
हजार वर्ष की सितम का बड़ा था जो जखीरा
आजादी तुम्हें क्यूं रास ना आया है रे बेईमान
तुम्हें समझ नहीं आया है तूँ है कितना अनजान
— उदय किशोर साह
