कुण्डली/छंद

रूप घनाक्षरी छंद

चहकेगा उपवन,

महकेगा मधुबन,

रात के बाद ही दिन,

आएगा निश्चित जान।।

मुरझाया चाहे बाग,

फूलों में था अनुराग,

सखा हिम्मत न हार,

होगा रँगीला जहान।।

पतझड का मौसम,

सार्थक हो परिश्रम,

रवि किरणें उजास,

झिलमिल हो विहान।।

कौशल से बन भूप,

राह में मिलेगी धूप,

सृष्टि रूप हो अनूप, 

सदा रहो गतिमान।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८