रूप घनाक्षरी छंद
चहकेगा उपवन,
महकेगा मधुबन,
रात के बाद ही दिन,
आएगा निश्चित जान।।
मुरझाया चाहे बाग,
फूलों में था अनुराग,
सखा हिम्मत न हार,
होगा रँगीला जहान।।
पतझड का मौसम,
सार्थक हो परिश्रम,
रवि किरणें उजास,
झिलमिल हो विहान।।
कौशल से बन भूप,
राह में मिलेगी धूप,
सृष्टि रूप हो अनूप,
सदा रहो गतिमान।।
