सद्भाव
स्वार्थों को साध सका ना
कष्टों की माला पहनी
आजाद मन पंछी
दुनियादारी निभा सका ना ।
हृदयप्रीत सदा रही भरपूर
हृदय भाव दिखा सका ना
संसार में हुआ मशहूर
अपनों से मिला अपमान सह सका ना ।
तन -मन हुआ बीमार
सांस -सांस है अटकी
ए मनुज ! मानवता क्यों रही हार
सब जिंदगी जी रहे भटकी- भटकी ।
टूटे मन को फिर से जोड़ें
चलो साथ मिलकर ढूंढे प्रीत
द्वेष की दीवार मिलकर तोड़ें
चलो सद्भाव की चलायें रीत।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
