सफ़र सुहाना
गाड़ी में बैठा नन्हा मन,
देखे जग का हर स्पंदन।
खिड़की से झाँके चुपके-चुप,
नयनों में जग सिमटा रूप।
हाथ में कोमल हरी फली,
जैसे धरती की हरियाली।
खेल-खेल में सीखे बात,
छोटी-छोटी जीवन की बात।
बाहर खड़ा सब्ज़ी वाला,
रंग भरा उसका हर थाला।
लौकी, ककड़ी, टमाटर लाल,
रंगों से भर जाए ख्याल।
माँ की गोद, सफ़र सुहाना,
हर पल लगता नया तराना
— डॉ. प्रियंका सौरभ
