मुक्तक/दोहा

जिजीविषा नित देखिये

गिरती मकड़ी डोर से, जब तक उलझे तार।
जिजीविषा नित देखिये, माने कभी न हार।।
तिनका चुन चुन चोंच में‌, मूक हृदय ले पीड़।
जिजीविषा खग की रही, बुनता सुंदर नीड़।।
भूखा घर से है चला, रोटी की ले आस।
खून पसीना एक कर, आता मुख उल्लास।।
नट का देखो खेल यह, रोटी एक सवाल।
औरों को खुश है करे, जीवन संकट डाल।।
कुछ करने की चाह में, भरिये वृहत उड़ान।
रुकना मत झुकना नहीं, चाहे हो तूफान।।
मन के हारे हार है, मत करना स्वीकार।
सुन भीतर आवाज को, करती जीत पुकार।।
मुट्ठी में आकाश हो, नैन सिंधु लें सोख।
जिजीविषा बल साध के, हिम्मत भरती कोख।।
खग मुड़ता जब शाम को, नीड़ बहुत है दूर।
आंख शिकारी से बचे, यत्न करे भरपूर।।
जिजीविषा जिस मन रही, उगता सूरज हाथ।
बढ़े धैर्य मन साथ ले, शिव उस का है नाथ।।

— शिव राज सन्याल

*शिव सन्याल

नाम :- शिव सन्याल (शिव राज सन्याल) जन्म तिथि:- 2/4/1956 माता का नाम :-श्रीमती वीरो देवी पिता का नाम:- श्री राम पाल सन्याल स्थान:- राम निवास मकड़ाहन डा.मकड़ाहन तह.ज्वाली जिला कांगड़ा (हि.प्र) 176023 शिक्षा:- इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लोक निर्माण विभाग में सेवाएं दे कर सहायक अभियन्ता के पद से रिटायर्ड। प्रस्तुति:- दो काव्य संग्रह प्रकाशित 1) मन तरंग 2)बोल राम राम रे . 3)बज़्म-ए-हिन्द सांझा काव्य संग्रह संपादक आदरणीय निर्मेश त्यागी जी प्रकाशक वर्तमान अंकुर बी-92 सेक्टर-6-नोएडा।हिन्दी और पहाड़ी में अनेक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। Email:. Sanyalshivraj@gmail.com M.no. 9418063995

Leave a Reply