कुण्डली/छंद

कुंडलियां छंद 

कुंडलियां छंद 

उलझे मन की डोर जब, हिय में हो संग्राम।

योग ध्यान से ही सखा, मन पर कसे लगाम।।

मन पर कसे लगाम, ज्ञान गगरी हैं भरना।

धन वैभव संतोष, प्रेम से साथी रहना।।

ठँडी-ठँडी हो छाँव, धूप से पुष्प न मुरझे।

सुलझे भ्रम की गाँठ, नेह की डोर न उलझे।।

मन दर्पण में झाँककर, ढूँढो कमियाँ आप।

कर सुधार निज आचरण, शीतल कर दो ताप।।

शीतल कर दो ताप, भाग्य तारा चमकेगा।

सुंदर हो आचार, सौख्य दीपक दमकेगा।। 

पुष्पित मंगल भाव, ईश चरणों में अर्पण।

अंतस श्रद्धा ठाँव, प्रेम दीपित मन दर्पण।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८

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