कविता

कविता- सेल्फ़ी का जूनून

मैं सेल्फ़ी हूँ, या सेल्फ़ी हूँ मैं
समझ न आए मुझको कुछ बात,
खाना-पीना होता रहेगा,
सेल्फ़ी से कटते दिन-रात।
सेल्फ़ी को जुनून है मेरा,
या मुझे जुनून है सेल्फ़ी का,
कोई तो बताई मुझे, मैं कंफ्यूज़,
जाने कैसे बना दीवाना सेल्फ़ी का!
सेल्फ़ी भी एक लत है ऐसी,
बुरी बला भी कह सकते हैं,
आगे खाई दिखे न पीछे पहाड़
सेल्फ़ी से दिन में तारे दिखते हैं!
लाइक-टिप्पणी के लालच में,
जाने कब-कैसे-क्यों फंस गए,
लपके लार लाइक-टिप्पणी के लिए,
“वायरल” होने की चाह में धंस गए!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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