वैभव ही वैभव
बस, ‘पंद्रह बरस’ की उम्र में ऐसा तूफ़ान उठा,
हर गली-मोहल्ले में बस वैभव का नाम गूंजा।
छोटे से कंधों पे सपनों का ये आसमान लिए,
गेंदबाजों ने आउट करने क्या-2 जतन किए।
बल्ला जब उसके हाथों में बिजली बन जाता,
हरेक चौका उम्मीदों का दीप नया जलवाता।
छक्कों की बरसात से मैदान भी है दहक उठे,
जब दर्शकों के चेहरें गर्वित होकर चमक उठे।
सिर्फ रन नहीं थे, वो जज़्बा भी दिखलाता था,
हर ‘शॉट’ में भारत का भविष्य मुस्कुराता था।
जब गेंद हवा में जाती तो दिल भी उड़ते जाते,
खिलाड़ियों के पुराने ‘रिकॉर्ड’ पीछे छूट जाते।
पैंसठ छक्कों की गूंज आसमान तलक पहुँची,
क्रिस गेल की ताकत भी उसके आगे है छोटी।
प्लेऑफ में ही तूफानी पचास की चमक ऐसी,
प्रत्येक क्रिकेट प्रेमी की धड़कन बन गई वैसी।
सिर्फ उनतीस गेंदों में वैभव ने 97वें रन ठोके,
हर गेंदबाज़ के हौसले उसने पल भर में रोके।
उसके हरेक प्रहार में ‘आत्मविश्वास’ छलकता,
जैसे कोई एक नया सूरज धरती पर चमकता।
— संजय एम तराणेकर
