रोज़ नए संग्राम
व्यूज़ बटोरन को रचें, रोज़ नए संग्राम।
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
व्यूज़ की इस दौड़ में, कैसा आया दौर,
सच की कीमत घट गई, शोर मचाए शोर।
लगा कैमरे सामने, सजते रोज़ मुकाम—
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
झगड़े भी तैयार हैं, आँसू भी तैयार,
हर रिश्ते के दर्द का, होता अब व्यापार।
निजता की दीवार पर, लिखते अपना नाम—
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
माँ की चिंता, बाप का, स्नेह भरा व्यवहार,
सब कुछ बनता जा रहा, दर्शक का बाज़ार।
लाइक-शेयर की चाह में, टूटी सभी लगाम—
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
सच की धीमी रोशनी, पीछे कहीं उदास,
झूठी चकाचौंध का, बढ़ता रोज प्रकाश।
क्षणिक प्रसिद्धि के लिए, करते उल्टे काम—
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
क्या पाया, क्या खो दिया, कब समझेंगे लोग।
व्यूज़ के लिए भागते, ये कैसा है रोग ।
रिश्तों से बढ़कर नहीं, कोई धन या दाम—
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
व्यूज़ बटोरन को रचें, रोज़ नए संग्राम।
घर-आँगन तक बेचते, यूट्यूबर कुछ नाम।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
