कविता

सिंदूरी स्वप्न

पलकों में जो छुपा हुआ था,
वह पैगाम सुनहरा है।
आज खुला है राज हृदय का,
रंग यह बेहद गहरा है।
अधरों का वह मौन समर्पण,
आज विवश होकर बोला
चुपके से सदियों का सावन,
इस सूने आँगन डोला।
माँग सजी जब लाल रेख से,
मन का दर्पण मुसकाया।
जिसको केवल चाहा दिल ने,
उसको अपने सम्मुख पाया।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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