गीत/नवगीत

भीड़ में अकेला

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

चेहरे हज़ारों पास मेरे,
आँख से आँख फिर भी अजनबी,
हँसी के शोर में भी देखो,
मन का कोना सन्नाटा मानता है।

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

शब्द उछलते कानों तक,
अर्थ कोई छूता नहीं,
रिश्ते सब रोजनामचे,
नाम बस नाम को मानता है।

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

कंधे से कंधा टकराए,
फिर भी दूरी योजन भर,
मैं “मैं” को ही ढो रहा,
साथ में चलते हुए साथ नहीं मानता है।

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

काश कोई इतना कह दे,
“रुको, सुनो, तुम हो तो सही”,
स्फोट सा फूटे भीतर तब,
टूटे भ्रम का पर्दा, सत्य पहचानता है।

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

भीड़ नहीं, बस एक मन चाहिए,
जो “तू” कहे, “मैं” मिट जाए,
फिर न साले अकेलापन,
जब अपना होना खुद को जानता है।

भीड़ में मैं हूँ खड़ा,
फिर भी
अकेलापन सालता है।

डॉ. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जवाहर नवोदय विद्यालय, मुरादाबाद , में प्राचार्य के रूप में कार्यरत। दस पुस्तकें प्रकाशित। rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in मेरी ई-बुक चिंता छोड़ो-सुख से नाता जोड़ो शिक्षक बनें-जग गढ़ें(करियर केन्द्रित मार्गदर्शिका) आधुनिक संदर्भ में(निबन्ध संग्रह) पापा, मैं तुम्हारे पास आऊंगा प्रेरणा से पराजिता तक(कहानी संग्रह) सफ़लता का राज़ समय की एजेंसी दोहा सहस्रावली(1111 दोहे) बता देंगे जमाने को(काव्य संग्रह) मौत से जिजीविषा तक(काव्य संग्रह) समर्पण(काव्य संग्रह)

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