कविता

प्रकृति क्या है ?

वह सुबह की पहली किरण है
जो अंधेरों को सहलाकर जगाती है
वह शाम की थकी हुई लालिमा है
जो दिनभर के सफ़र को विश्राम दिलाती है
प्रकृति कोई दृश्य भर नहीं,
वह ईश्वर की धीमी प्रार्थना है
जो कभी फूलों की मुस्कान बनकर खिलती है,
तो कभी नदियों की कल-कल में गुनगुनाती है
वो जानती है कि हर अँधेरी रात के पीछे
एक सुहानी सी भोर छिपी होती है
और हर सूखी डाल पर कहीं न कहीं
एक नई कोंपल खिलने को तैयार बैठी होती है
उसकी सबसे सुन्दर प्रार्थना
खिले हुए फूलों की चाह नहीं
बल्कि वो सूखी हुई शाखें हैं
जो हर पतझड़ के बाद भी
वसंत की प्रतीक्षा करना नहीं छोड़तीं हैं
वो हर क्षण यही चाहती है यही कहती है
कि मत डर अपने टूटने से,
मत घबरा अपने बिखरने से
मैंने फूलों को मुरझाते देखा है,
फिर उन्हीं डालियों पर मगर उन्हें
खिलते मुस्कुराते भी देखा है
इसलिए यदि कभी जीवन
तुम्हें ज़मीन पर ला पटके
तो आँसू पोंछकर उठ जाना
क्योंकि हार गिरने में नहीं,

गिरकर पड़े रहने में है
हार अंधेरे में नहीं,
अंधेरे को ही सच मान लेने में है।
और जीत?
जीत तो बस इतनी है कि
हर पतझड़ के बाद भी
तुम्हारे भीतर यह अहसास रहे
हर एक वसंत जीवित रहे

— रेनू ‘अंशुल’

रेनू ‘अंशुल'

मैं रेनू अग्रवाल हूँ और रेनू ‘अंशुल’ के नाम से एक साहित्यकार के रूप में जानी पहचानी जाती हूँ । लेखन के साथ साथ मंच संचालन करती हूँ । सामाजिक कार्यों में संलग्न हूँ । पत्र पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं और साथ ही All India Radio से भी मेरे कार्यक्रम ( कविता, कहानी, नाटक, वार्ताएँ आदि) निरंतर प्रसारित होते रहते हैं । कुछ कार्यक्रम दूरदर्शन से भी प्रसारित हुए हैं । मेरी अब तक सात किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । जिनमें दो उपन्यास, दो कविता संग्रह और तीन कहानी संग्रह हैं । उपन्यास के रूप में अगली पुस्तक प्रकाशाधीन है । इस यात्रा में कुछ सम्मान आदि भी मेरी ख़ुशक़िस्मती बने हैं ।

Leave a Reply