पैसा या रिश्ता..
पैसा…पैसा….हर पल केवल व्यापार की चिंता। न समय पर सोना, न खाना। घर परिवार में सारे ऐषो आराम का इंतजाम था। लेकिन अपने लिए, परिवार के लिए वक्त नहीं था। न सुख-दुख का कोई साथी था।
अपने बच्चे, पत्नी के साथ कब घूमने गए चिंतामणि जी, उन्हें याद नहीं। तगडा बैंक बैंलेंस, सोना, चांदी….देख-देखकर मन खुश होता।
सुधा जी घर का ध्यान रखती। मेहमानों की आवभगत, बच्चों का लालन पालन, घर गृहस्थी के सारे काम-काज संभालते जिंदगी गुजर रहीं थी। कभी-कभी बगावती स्वर उभर आता। उदासीनता घेर लेती। लेकिन पुनः बच्चों की मासूमियत में वे सब कुछ भूल जाती।
अपने पैसे का रुबाब, रुतबे की संभाल में चिंतामणि जी रात दिन बेचैन रहते। धीरे-धीरे वे बीमार रहने लगे।
सुना है, आज मीटिग में ही वे बेहोश हो गिर पडे। रक्तचाप बढ़ गया था अचानक। लकवाग्रस्त हो बिस्तर पर पडे थे।
कौन अपना…कौन पराया ….
पैसा या रिश्ता..
कौन अहम्?
अब पता चल रहा था। एक सूनापन मन में पैठ गया था। अकेलापन डरा रहा था।
बच्चें भी उनसे दूरी बनाए रखते। हारे हुए जुआरी की तरह भरे-पूरे परिवार के होते हुए भी वे अकेले थे।
काश…अपनों के साथ निभाया होता। आत्मीयता भरे रिश्तों के बंधन में बंधकर रहे होते वे।
अब क्या फायदा, जब चिडिया चुग गई खेत?
किसे क्या कहे, जब आग खुद की लगाई हो?
