अन्तः अस्ति आरम्भः
निहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।
अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।
उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ लाल।
विच्छिन्न हुआ उससे, जैसे बीत गया हो साल।।
जीवन-संगीत ठहरा, अब अवश्य नवीन होगा।
शांत सरोवर-तल पर जब, पर्ण स्थिर होगा।।
चिन्तामग्न पर्ण विचारे, उसे कुछ करना होगा।
जाऊँ क्यों यूँ ही, निशाँ मुझे भी छोड़ना होगा।।
जल तक पहुँचा जब, हर्षित स्पर्श-नमन हुआ।
वृत्ताकार वीचियों का, उस बिन्दु से उदय हुआ।।
क्षणभर मे अन्त, अनन्त हो विस्तारित हुआ।
शुष्क पर्ण-निशाँ से, नव-जीवन सृजित हुआ।।
कभी क्षणभर, कभी संवत्सर, और कभी काल।
जीवन गतिमान सदैव, निज स्वाभाविक चाल।।
फिर फिक्र क्या, चलो चलें हम भी अपने हाल।
संभला, उठा, चल पड़ा गढ़ने अपनी मिसाल।।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
