उत्तरदायित्व
सूरज होते भी
चारों ओर है घोर अंधेरा,
रात के वक्त रोशनी में भी अंधेरा !
खंडहर से दिल
और रेगिस्तान से चित्त में भी
कैसा जमाया है अंधेरे ने डेरा!
लाखों कोशिश हो रही है नाकामयाब,
कब पूरे होंगे रंगीन रक्त प्यासें ख्वाब?
फिर भी कुछ दिये
झंझा में भी जान हथेली पर रखकर,
जूझ रहे हैं अपना उत्तरदायित्व मानकर।
— पुष्करराय जोषी
