कहानी

वो रेशम ही थी

​शहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, ऊंची इमारतें और मसनूई रोशनियां कभी कभार इंसान को अंदर से बिल्कुल ख़ाली कर देती हैं। रेहान के पास आज इस बड़े शहर में वो सब कुछ था जिसकी लोग तमन्ना करते हैं,नाम, पैसा और आसाइशें। लेकिन जब भी शाम ढलती और वो अपनी बालकनी की ग्रिल से बाहर देखता, तो उसे लगता कि दिल का एक बहुत बड़ा हिस्सा वहीं पीछे छूट गया है, उस दूर दराज़ गाँव की वादियों में।
​वो उससे बहुत प्यार करता था। वो प्यार जो हाई स्कूल के कच्चे रास्तों पर शुरू हुआ था। ​वो गाँव की एक अल्हड़, बिंदास और मासूम सी लड़की थी,रेशम। रेशम का हुस्न किसी तराशे हुए हीरे की तरह नहीं, बल्कि जंगल की वादियों के उस कुदरती हुस्न जैसा था जो हवा के झोंकों, बहते झरनों और हरियाली में बसा होता है। उसकी हंसी में गाँव की नदी की रवानी थी और उसकी आँखों में फूलों की चमक। स्कूल की घंटी बजते ही उसका सहेलियों के साथ खिलखिला कर भागना, रेहान के दिल में एक हलचल सी मचा देता था।
​फिर वक़्त बदला। स्कूल की पढ़ाई ख़त्म हुई, तो ज़िंदगी दोनों को अलग मोड़ पर ले आई। रेहान को आला तालीम और मुस्तक़बिल बनाने के लिए शहर आना पड़ा, और रेशम उसी गाँव की वादियों में रह गई। ये एक ऐसी जुदाई थी जिसका कोई बाक़ायदा अलविदा नहीं था, बस हालात की लकीरें बीच में आ गई थीं।
​बरसों गुज़र गए, न कोई राब्ता हुआ न कोई मुलाक़ात। रेहान अक्सर सोचता,अब कैसे होगी मुलाक़ात? क्या वो अब भी वैसी ही अल्हड़ होगी? क्या वो मुझे याद करती होगी?
​आज भी, जब शहर पर सुर्ख़ ग़ुरूब-ए-आफ़ताब का साया गहरा हो रहा था, रेहान ने अपनी डायरी निकाली जिसके सफ़्हे पर लिखी हुई वो सतरें दर्ज थीं जो उसके दिल की पुकार बन चुकी थीं,
​आ जा कि अभी ज़ब्त का मौसम नहीं गुज़रा,
आ जा कि पहाड़ों पे अभी बर्फ़ जमी है।
​उसने गहरा सांस लिया। पहाड़ों पर जमी बर्फ़ की तरह उसकी मोहब्बत भी वक़्त के थपेड़ों के बावजूद पिघली नहीं थी, बल्कि वहीं ठहर गई थी। उसने खिड़की से बाहर फैले चमकते हुए शहर को देखा, जहाँ हर तरफ़ रौनक़ थी, लेकिन उसके लिए सब बेमायने था। डायरी के अगले सफ़्हे पर लिखी लाइनें जैसे उसके मौजूदा हाल का मर्सिया पढ़ रही थीं।
​ख़ुशबू के जज़ीरों से सितारों की हदों तक,
इस शहर में सब कुछ है मगर तेरी कमी है।
​”इस शहर में सब कुछ है मगर तेरी कमी है…” रेहान ने धीमे से दोहराया। उसे महसूस हुआ कि अब मज़ीद ज़ब्त करना मुमकिन नहीं। उस अल्हड़ हुस्न, उस सच्ची मोहब्बत और गाँव की इन पुरसुकून वादियों की तड़प ने उसे मजबूर कर दिया।
​उसने अपना बैग उठाया। अब उसे शहर की इस मसनूई चमक में नहीं रहना था। उसे वापस जाना था—अपनी इसी पुरानी दुनिया में, जहाँ रेशम और उसका अधूरा प्यार उसका मुंतज़िर था। क्योंकि जब तक वो अल्हड़ लड़की दोबारा नहीं मिलती, उसकी ज़िंदगी का ये अफ़साना मुकम्मल नहीं हो सकता था।
​रेहान ने जब शहर छोड़ा तो लोगों ने उसे दीवाना कहा। सब का कहना था कि करियर और पढ़ाई के उरूज पर यूँ सब कुछ छोड़ कर जाना नादानी है, लेकिन रेहान का मन अब शहर की किताबों और पढ़ाई में लगता ही कहाँ था? उसके ज़ेहन पर तो गाँव की मिट्टी की ख़ुशबू और रेशम का तसव्वुर हावी हो चुका था। वो जानता था कि दिल का सुकून किसी बड़े दफ़्तर या डिग्री में नहीं, बल्कि अपने गाँव की इसी ज़रख़ेज़ ज़मीन में है जहाँ वो अब खेती बाड़ी करना चाहता था, अपने हाथों से फ़सलें उगाना चाहता था।
​जब रेहान की गाड़ी गाँव की हुदूद में दाख़िल हुई, तो उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। ये उसका अपना भी तो गाँव था। वही मिट्टी, वही पुराने दरख़्त, और दूर नज़र आते पहाड़। लेकिन एक ख़लिश दिल में मुसलसल तड़प रही थी,क्या रेशम उसे मिलेगी? और अगर मिली, तो क्या वो उससे बात करेगी?
​वक़्त ने करवट ली थी और वो अल्हड़ सी बच्ची अब एक ख़ुबरू दोशीज़ा बन चुकी होगी। बचपन का वो सीधा साधा प्यार अब जवानी की दहलीज़ पर खड़ा था, जहाँ हया और ख़ामोशी के पहरे सख़्त हो जाते हैं।
​एक शाम, जब रेहान अपने खेतों की मेंढ़ पर खड़ा लहराती हुई हरियाली को देख रहा था, तभी दूर पगडंडी पर उसे एक जानी पहचानी आहट सुनाई दी। वो रेशम ही थी। जिसके चेहरे पर जंगल की वादियों का सारा हुस्न सिमट आया था, और आँखों में अब शरारत की जगह एक गहरी हया थी।
​रेहान की नज़रें रेशम पर पड़ीं तो उसके क़दम वहीं रुक गए। रेशम ने भी जब शहर से लौटे रेहान को देखा, तो उसकी रफ़्तार धीमी हो गई।
​”रेशम…” रेहान के लबों से बस इतना ही निकल सका।
​रेशम चंद लम्हे ख़ामोश खड़ी रही। उसके हाथ में मौजूद दाती (दरान्ती) पर उसकी गिरफ़्त मज़बूत हो गई। रेहान को लगा शायद वो बिना बात किए गुज़र जाएगी, लेकिन रेशम के क़दम ठहर गए। उसने नज़रें झुकाईं, फ़िर आहिस्ता से चेहरा उठा कर रेहान की तरफ़ देखा। उसकी तीखी आँखों में पुरानी यादों का एक सैलाब था और होंटों पर एक धीमी, मानूस सी मुस्कुराहट उभर आई।
​”लौट आए?” रेशम ने धीमी लेकिन पुरएतमाद आवाज़ में पूछा। उसकी आवाज़ में गाँव के झरने का सा सुकून था।
​”हाँ, हमेशा के लिए। अब यहीं खेतों में फ़सलें उगाऊँगा,” रेहान ने दिल की धड़कनों को संभालते हुए जवाब दिया।
​रेशम ने कोई तवील बात नहीं की, बस धीरे से सर हिलाया और एक गहरा सांस लेकर पगडंडी पर आगे बढ़ गई। लेकिन उसका वो ठहरना, वो मुस्कुराना और सिफ़्फ़ दो लफ्ज़ कहना ही रेहान के लिए काफ़ी था। उसने रेशम की आँखों में अपने लिए वही पुराना एहतिराम और चाहत देख ली थी जो वक़्त की गर्द में भी धुंधली नहीं हुई थी।
​शाम की ठंडी हवा चली तो रेहान को महसूस हुआ कि उसके दिल का अधूरापन दूर हो रहा है। शहर की रौनक़ों में जो सुकून उसे कभी न मिल सका, वो उसे अपनी मिट्टी और रेशम की इस एक धीमी सी मुस्कुराहट में मिल गया था। अब उसकी ज़िंदगी की नई फ़सल और नई शुरुआत होने वाली थी।
​अब गाँव के दिन बदलने लगे थे और रेहान की ज़िंदगी में वो ठहराव आ गया था जिसकी तलाश में वो शहर से आया था। सुबह सवेरे जब सूरज की पहली किरन पहाड़ों की बर्फ़ को छू कर खेतों पर गिरती, तो रेहान अपने काम में जुट जाता। अब रेशम का पगडंडी से गुज़रना महज़ एक इत्तिफ़ाक़ नहीं रहा था, बल्कि ये उनके दिन का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा बन चुका था। वो कभी ट्रैक्टर चलाता कभी अपनी बाइक से खेत पर जाता।
​दोनों की मुलाक़ातें अब अक्सर होने लगी थीं। कभी नदी के किनारे, जहाँ रेशम पानी भरने आती, तो कभी उन घने दरख़्तों की छाँव में जहाँ जंगल की हवाएं गीत गाती थीं। उनकी गुफ़्तगू बहुत लम्बी नहीं होती थी,रेशम की वो अल्हड़ सी हया और रेहान का एहतिराम, दोनों के दरम्यान एक ख़ूबसूरत तवाज़ुन बनाए रखता था। वो कभी खेतों की फ़सल पर बात करते, तो कभी बचपन के उन स्कूल के दिनों पर, जब वो सिर्फ़ एक दूसरे को चोरी छुपे देखा करते थे।
​लेकिन मोहब्बत और ख़ुशबू कभी छुपाए नहीं छुपते।
​जैसे जंगल में रात की रानी खिलती है तो उसकी महक पूरे माहौल को अपने हिसार में ले लेती है, बिल्कुल वैसे ही उनकी इन मासूम मुलाक़ातों की ख़ुशबू धीरे-धीरे पूरे गाँव में फ़ैलने लगी। पगडंडियों पर रेशम का मुस्कुरा कर गुज़रना और रेहान का अपने खेतों को छोड़ कर उसे दूर तक जाते देखना, अब गाँव के बुज़ुर्गों और नौजवानों की नज़रों से छुपा न रहा था।
​जब रेशम अपनी सहेलियों के साथ कुएं पर जाती, तो सहेलियों की छेड़-छाड़ और धीमी मुस्कुराहटें रेशम के गालों पर गुलाबी हया बिखेर देतीं। गाँव के चौपाल में भी अब धीरे-धीरे ये चर्चे होने लगे थे कि “शहर से लौटा रेहान अब सिफ
सिर्फ़ अपनी मिट्टी से नहीं, बल्कि इस वादी की रेशम से भी पूरी तरह दिल लगा बैठा था।
​ये चर्चे किसी बदनामी के नहीं, बल्कि एक सच्ची ओर पुरानी मोहब्बत के एहतिराम के थे। गाँव के लोग जानते थे कि रेहान एक सुलझा हुआ इंसान है जो रेशम के लिए सब कुछ छोड़ कर आया है। उनकी मोहब्बत की इस फैलती हुई ख़ुशबू ने माहौल में एक अजीब सा सहर पैदा कर दिया था, जहाँ हर कोई अब इन दोनों को साथ देखने का आदी हो रहा था।
​रेहान को अब अपने दिल में वो ‘ज़ब्त का मौसम’ ख़त्म होता हुआ महसूस हो रहा था। उसे लगता था कि रेशम की हर एक मुस्कुराहट उसके दिल के ज़ख़्मों को भर रही है। अब सवाल ये था कि पूरे गाँव में फैलती हुई ये ख़ुशबू क्या इन दोनों को हमेशा के लिए एक पक्के बंधन में बांध देगी?
​मुहब्बत की जो ख़ुशबू पूरे गाँव में फैल चुकी थी, आख़िरकार रंग लाई। जब रेहान और रेशम के पाकीज़ा प्यार की बात दोनों के ख़ानदानों तक पहुँची, तो बड़ों ने बोझिल रसूमात की दीवारें खड़ी करने के बजाय इस रिश्ते पर अपनी मोहब्बत की मोहर लगा दी। दोनों का परिवार इस रिश्ते के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गया।
​फ़िर तो जैसे पूरे गाँव में ख़ुशियों का एक नया मौसम आ गया। दोनों के घरों में तैयारियाँ शुरू हो गईं, दीवारों पर चूना फिरा, और शादी के शानदार मंडप सजाए गए। वो दिन भी आया जब शहनाइयों की गूंज में बारात आई। रेशम, जो कभी स्कूल की अल्हड़ लड़की थी, आज सुर्ख़ जोड़े में सज कर दुल्हन बनी। जब रेहान अपनी दुल्हन को ब्याह कर अपने घर लाया, तो गाँव की फ़ज़ाओं में एक अजीब सा सुरूर था।
​वो रात दोनों की ज़िंदगी की सबसे हसीन रात थी। सुबह तो महकी ही थी, लेकिन वो रात भी ख़ुशबुओं से महक उठी। रेशम शर्म से पानी-पानी हो रही थी और उसने हया से अपनी निगाहें नीची करके झुका लीं। रेहान ने आगे बढ़कर, मोहब्बत और मान के साथ, रेशम का हाथ पूरे ज़ोर और मज़बूती से अपने हाथ में थाम लिया। ये सिर्फ़ दो हाथों का थामना नहीं था, बल्कि अब ये दो सितारों का एक ख़ूबसूरत मिलन था।
​वक़्त गुज़रता गया और ज़िंदगी अपनी तमाम तर रानाइयों के साथ लहराने लगी। अब रेहान अकेला खेतों में नहीं जाता था। गाँव की इसी ज़रख़ेज़ ज़मीन पर, अब वो दोनों मियाँ-बीवी साथ जाते, कंधे से कंधा मिलाकर काम करते और अपने हाथों से हरी-भरी फ़सलें उगाते। अब वो गाँव तक महदूद नहीं थे, अपनी लहराती फ़सलों की तिजारत और काम के सिलसिले में वो दोनों कभी कभार शहर भी जाते, लेकिन अब शहर उनके लिए कोई बोझ नहीं बल्कि एक ज़रूरत था, क्योंकि उनका दिल तो गाँव की मिट्टी में धड़कता था।
​रेहान की ईमानदारी, मेहनत और सुलझे हुए मिज़ाज ने बहुत जल्द गाँव के लोगों के दिल जीत लिए। गाँव वालों ने मुत्तफ़िक़ा तौर पर रेहान को अपना मुखिया,यानी सरपंच चुन लिया।
​एक पढ़ा-लिखा, मिट्टी से जुड़ा और दर्द-ए-दिल रखने वाला सरपंच मिलने से पूरे गाँव की तक़दीर बदल गई। रेहान और रेशम की सरपरस्ती में गाँव का हर फ़र्द ख़ुश था। अब वहाँ न कोई झगड़ा था न कोई बेचैनी। गाँव में हर तरफ़ अमन, चैन, सुकून और बेपनाह ख़ुशहाली फैल चुकी थी, ओर उनकी मोहब्बत की कहानी गाँव की तारीख़ का सबसे ख़ूबसूरत बाब (अध्याय)बन गई।
​रेहान और रेशम का ये अफ़साना अब सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि उस गाँव की रवायत बन चुका था। चौपाल में जब भी कोई नई नस्ल का नौजवान मोहब्बत या ज़िंदगी के फ़ैसलों में भटकता, तो गाँव के बुज़ुर्ग रेहान और रेशम की मिसाल देते।
​सरपंच बनने के बाद रेहान ने गाँव के स्कूल को सबसे पहले पक्का और बड़ा करवाया, जहाँ कभी उसकी और रेशम की पहली नज़र मिली थी। वो अक्सर रेशम से हँसते हुए कहता।
“अगर मैं स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़ कर शहर न गया होता, तो शायद मिट्टी की और तुम्हारी क़ीमत इतनी जल्दी समझ न आती।”
​रेशम अपनी उसी मानूस, अल्हड़ मुस्कुराहट के साथ जवाब देती।
“और अगर आप वापस न आते, तो पहाड़ों पर जमी वो बर्फ़ कभी न पिघलती।”
​अब शाम के वक़्त जब दोनों अपने हरे-भरे खेतों के दरम्यान बने छोटे से मचान पर बैठते, तो दूर पहाड़ों के पीछे डूबता हुआ सूरज बिल्कुल वैसा ही मंज़र पेश करता जैसा बरसों पहले रेहान की डायरी के उस सफ़्हे पर था। रेशम चाय का कप रेहान की तरफ़ बढ़ाती, और रेहान रेशम का हाथ थाम कर धीमे सुरों में गुनगुनाता।
​खुशबू के जज़ीरों से सितारों की हदों तक बस तू है तू ही तू है।​फिर वो मुस्कुरा कर रेशम की तरफ़ देखता और कहता, “लेकिन अब ये कमी हमेशा के लिए पूरी हो चुकी है।”
​गाँव की फ़ज़ा में अमन, चैन और ख़ुशहाली की ये फ़सल अब नस्ल दर नस्ल लहराने के लिए तैयार थी। इस तरह एक अधूरे स्कूल के प्यार ने न सिर्फ़ दो दिलों को मिलाया, बल्कि पूरे गाँव की तक़दीर को अमन और मोहब्बत के रंग में रंग दिया।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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