राजनीति

संसद में हंगामा ही सिर्फ मकसद नहीं होना चाहिए

लोकसभा और राज्यसभा का मानसून सत्र लगभग हंगामे की भेंट चढ़ गया है। जहां देश को आगे बढ़ाने के लिये चर्चा होना चाहिए, वहां दो सियासी घरानों के पुत्रों का अहंकार उसे ले डूबा, जबकि लोकतंत्र की बुनियाद इस बात पर टिकी है कि सदन में चर्चा, बहस और असहमति के माध्यम से देश के कानून और नीतियां तय की जाएं। हाल के वर्षों में लोकसभा, राज्यसभा, राज्यों की विधानसभाओं और विधान परिषदों में कामकाज के तरीकों को लेकर एक बड़ा विमर्श खड़ा हुआ है। एक आम धारणा यह बन गई है कि सदन को सुचारू रूप से चलाने की पूरी जिम्मेदारी केवल सत्ता पक्ष (सरकार) की है, जबकि विपक्ष का काम केवल विरोध करना है। यह विषय भारतीय राजनीति में एक गंभीर चर्चा का केंद्र है। एक तरफ जहां आलोचकों का मानना है कि विपक्ष रचनात्मक बहस से पीछे हटकर केवल हंगामे की राजनीति कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष का तर्क है कि सरकार उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त समय और मंच नहीं देती है।गौरतलब हो, सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष में संसदीय नियमों और परंपराओं के अनुसार, सदन चलाना दोनों की एक साझा जिम्मेदारी है, जब दोनों पक्षों में से कोई भी इस जिम्मेदारी से पीछे हटता है, तो सदन की कार्यवाही बाधित होती है। आलोचकों का कहना है कि विपक्ष कई बार चर्चा के बजाय वॉक आउट (सदन से बाहर चले जाना) या वेल (आसन के सामने का स्थान) में आकर नारेबाजी करने का रास्ता चुनता है, जिससे महत्वपूर्ण समय और जनता का पैसा बर्बाद होता है।

बहरहाल, अतीत से वर्तमान तक सदन में हंगामा और गतिरोध कोई नई बात नहीं है। भारतीय संसद और विधानसभाओं का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब तीखी बहस और व्यवधान हुए हैं। अतीत में भी बोफोर्स घोटाला (1980 के दशक के उत्तरार्ध) और 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन (2010) जैसे बड़े मुद्दों पर विपक्ष ने हफ्तों तक संसद नहीं चलने दी थी। इन घटनाओं के दौरान पूरा-पूरा सत्र बिना किसी विधायी कार्य के धुल गया था। इसी तरह से उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु जैसी राज्य विधानसभाओं में अतीत में ऐसे दृश्य देखे गए हैं जहां माइक तोड़े गए, कागज फेंके गए और मार्शलों को विधायकों को बाहर निकालना पड़ा। जानकारों का मानना है कि पहले के समय में हंगामे के बीच भी बड़े नेता अपनी बात तर्कों के साथ रखते थे और सरकारें उनकी बात सुनती थीं। वर्तमान में सोशल मीडिया और लाइव टेलीकास्ट के दौर में, कई बार नेता सदन के भीतर ठोस बहस करने के बजाय राजनीतिक बयानबाजी और त्वरित सुर्खियां बटोरने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।आलोचकों का आरोप है कि विपक्ष किसी एक नीति या कानून पर टिककर बहस करने के बजाय लगातार अपने राजनीतिक दांव-पेंच बदलता रहता है। उदाहरण के लिए, चुनाव के समय उठाए गए मुद्दे, संसद सत्र शुरू होने पर बदल जाते हैं और सत्र के दौरान कानून व्यवस्था, बेरोजगारी या किसी घोटाले के आरोप पर ध्यान केंद्रित हो जाता है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष चर्चा से भागने के लिए ऐसा करता है। उधर, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विरोध में विपक्ष कई बार बेहद आक्रामक रुख अपनाता है। सदन में गंभीर आरोप लगाने के बाद जब सरकार की तरफ से जवाब देने की बारी आती है, तो विपक्ष वॉकआउट कर जाता है। इसे सत्ता पक्ष द्वारा आरोप लगाकर भागने की राजनीति कहा जाता है। लोकतंत्र में चर्चा का महत्व सदन का मुख्य उद्देश्य कानून बनाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है। जब सदन में चर्चा होती है, तो जटिल से जटिल मुद्दों का समाधान निकलता है। जीएसटी कानून या अतीत में हुए परमाणु समझौते जैसे बड़े मामलों पर लंबी बहसों के बाद ही आम सहमति बन पाई थी। सदन में लगातार होने वाले हंगामे और काम न होने से जनता में यह संदेश जाता है कि उनके प्रतिनिधियों द्वारा उनके टैक्स के पैसे का सही उपयोग नहीं हो रहा है।

हंगामे के कारण बार-बार सदन को स्थगित करना पड़ता है। इससे देश के जरूरी कानूनों पर बहस नहीं हो पाती और जनता के पैसे की बर्बादी होती है। किसकी गलती ज्यादा है, एक बेहद संवेदनशील और जटिल विषय है। राजनीतिक विश्लेषकों और जनता के नजरिए से देखें तो इस सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों पक्षों की अपनी-अपनी कमियां और तर्क नजर आते हैं। विपक्ष अक्सर किसी मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए हंगामा तो करता है, लेकिन जब सरकार उस पर नियम के तहत चर्चा कराने को तैयार होती है, तो विपक्ष अपनी शर्तों पर अड़ जाता है। तब ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष सरकार की हर अच्छी-बुरी नीति का केवल विरोध करने की नीति पर चल रहा है। सदन रचनात्मक सुझाव देने के बजाय सोशल मीडिया और मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए सदन के भीतर आक्रामक रुख अपनाया जाता है।गंभीर आरोप लगाकर जवाब सुने बिना वॉकआउट कर जाना संसदीय मर्यादा के खिलाफ माना जाता है। दूसरी तरफ, एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि सदन को सुचारू रूप से चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होती है, और उसकी रणनीतियों में भी कमियां हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार संख्या बल के दम पर बिना लंबी बहस या विपक्ष को विश्वास में लिए बिना महत्वपूर्ण बिल पास करा लेती है। जब विपक्ष किसी गंभीर या संवेदनशील मुद्दे पर तुरंत चर्चा की मांग करता है, तो सरकार कई बार तकनीकी नियमों का हवाला देकर उसे टालने की कोशिश करती है, जिससे गतिरोध और बढ़ जाता है। विपक्ष का तर्क है कि उनके प्रमुख नेताओं के माइक बंद कर दिए जाते हैं या उनके भाषणों के हिस्सों को रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है, जिससे उनके पास हंगामे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।खैर, आम जनता इस पूरे माहौल को बेहद बारीकी से देख रही है और उसके दृष्टिकोण से जनता इस बात से नाराज है कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि देश की समस्याओं को सुलझाने के बजाय आपस में लड़ रहे हैं। संसद या विधानसभा चलाने में हर मिनट लाखों रुपये का सार्वजनिक पैसा खर्च होता है, जो हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। जनता किसी एक को पूरी तरह दोषी नहीं मानती। लोग चाहते हैं कि विपक्ष जिम्मेदारी से अपनी बात रखे और सरकार बड़े दिल से विपक्ष की चिंताओं को सुने।लब्बोलुआब यह है कि सदन में बने इस तनावपूर्ण माहौल के लिए दोनों ही पक्ष कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सत्ता पक्ष में सुनने का धैर्य हो और विपक्ष में तर्कों के साथ बात रखने का अनुशासन हो। जब तक दोनों पक्ष अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर देशहित को आगे नहीं रखेंगे, तब तक सदनों का माहौल ऐसा ही बना रहेगा।

संजय सक्सेना

संजय सक्सेना

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