कविता

यूँ ही अचानक!

यूँ ही अचानक एकाकीपन में,
आज फिर उपस्थिति हुई तुम्हारी,
सहरा में जैसे सुमन खिल गया हो,
खुशी से आंखें हो गईं नम हमारी।

अब तो हर पल लगे सुहाना मीत,
हवा ने छेड़ी सरगम गाएं बादल,
मन में लहर उमंग की उछली प्रीत,
पत्ता-पत्ता हुआ ज्यूं खुशी से पागल।

तन्हाइयों में डूबी थी जिंदगानी,
मिल गया आज उसको किनारा,
हर पल जैसे हो गया नई कहानी,
यादों का फिर खुल गया पिटारा।

याद आते हैं किस्से हसीं शामों के,
खिला चाँद वो चाँदनी रातों के पल,
मीठे-सुवासित वो खत पयामों के,
काँटों-सी चुभे तुम बिन पवन शीतल।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244