क्षमा
चलो कुछ यूँ अपने सत्य को स्वीकारते हैं,
ज़िन्दगी को अपनत्व से भरते हैं।
किसी को पुरस्कृत नहीं कर सकते तो,
तिरस्कृत भी नहीं करते हैं।
अपमान करना या सहना नहीं जायज,
सम्मान यथायोग्य करते हैं।
शाख से टूटे सुमन को फिर लगा नहीं सकते,
कोई न टूटे जतन करते हैं।
जोड़ा हुआ धन तो साथ ले नहीं जा सकते,
नेकी का नेक काम करते हैं।
टूटा हुआ हृदय तो फिर जुड़ नहीं सकता,
हृदय को अमन का चमन करते हैं।
क्षमा सबसे बड़ा कारगर मरहम है दोस्तो,
क्षमा मांगते, क्षमा भी करते हैं।
चोट लगे खुद को तो कितनी पीड़ा होती,
किसी की पीड़ा का एहसास करते हैं।
— लीला तिवानी
