रखवाल बने भेड़िए
कुर्सी खातिर बदलते, नेता इतने ढंग।
गिरगिट भी शरमा रहा, देखे इनका रंग।।
बगुला भगत बने फिरें, मुख पर मीठी बात।
मछली दिखते ही मगर, भूलें दिन और रात।।
लोमड़ियों की चाल से, चलता सारा खेल।
जनता समझे देर से, किसका कैसा मेल।।
रखवाल बने भेड़िए, मेमन जाए हार।
रक्षक हिस्सेदार हों, किसका हो अधिकार?।
बिच्छू फूलों में छिपा, करता मीठा वार।
डंक लगे तब समझते, कैसा था व्यवहार।।
विषधर फन फैला रहे, ओढ़े श्वेत नकाब।
दाँत दिखें तो देर क्या, समझो खुली किताब।।
कौआ मोती ले उड़ा, हंस रहा दरबार।
योग्यताएँ कतार में, मिलता बस इंतजार।।
मगरमच्छ के आँसुओं, से भरते सब ताल।
दर्द दिखाकर वोट लें, फिर जनता बेहाल।।
सियार की हुंकार में, दबती सच आवाज।
जितना ऊँचा शोर हो, उतना सच्चा राज?।
बंदर बाँटे न्याय जब, पेड़ हुआ दरबार।
लिए हाथ में फल रहे, उसका ही अधिकार।।
अगर चुनावों में मिले, रिश्तेदार भगवान।
वोट पड़ा तो भूलते, किसका था सम्मान।।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
