एक तीस वर्षीय युवती
मैंने उसको देखा
एक गंभीर चेहरे के साथ
उदासी भरपूर थी
तीस वर्षीय एक युवती को
यौवन से परिपूर्ण
लहराते बाल
गौर वर्ण से सुसज्जित थी
हाथों में मेंहदी लगी थी
आंखों में अंजन
होंठो पर हल्की लालिमा थी
कसा बदन था
बांहों में ताजगी थी
पैरों में महावर लगा था
गहनें भी धारण किया था
महंगी साड़ी में
दुनिया की सबसे खूबसूरत
कोई एक बार भी देखता
उसके रुप सौंदर्य पर
संपूर्ण तन-मन न्यौछावर कर देगा
आखिर उसके गुमसुम होने का
कोई कारण हो सकता है
जो अकेले बैठी है बेंच पर
एक खूबसूरत गार्डेन में
उसने शरीर में
सुगंधित इत्र भी लगा रखी है
ऐसा लग रहा है
कोई उस पर
पूर्णतया आसक्त है
इस प्रकार
रुप सौंदर्य में
कोई कमी नहीं है
फिर भी नायिका उदास है
उसकी उदासी को
मैं जानना चाहा
उसका जबाब था-
मेरा प्रथम प्रेम
धोखे से भरा रहा
जो मेरे पवित्र मन रूपी मंदिर को
अस्वच्छ कर दिया
कोई भी मेरे भरोसे को
अब जिंदा नहीं रख पायेगा
मैं टूट गयी हूँ
यह संसार
धोखों से भरा है!
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
