अक्स
विधा- कविता
शीर्षक- अक्स
दर्पण जब भी देखूं मैं, एक छवि दिखलाय,
उस छवि-सा कोई और नहीं, दर्पण मोहे बताय।
कभी-कभी वह पूछता, “क्यों रहतीं हो उदास!”
मैं चुप-सी रह जाती हूं, कहने को नहीं कुछ ख़ास!
कभी-कभी फिर पूछता, “क्यों रहतीं चुपचाप!”
मन की बात कहूं, सुने, कर लेता विश्वास!
कभी-कभी वह पूछता, “क्या खुद पर संदेह!”
नैन मूंद बैठी रहूं, सपनों में भरता नेह!
कभी-कभी फिर पूछता, “कैसे हों सपने साकार!”
शिद्दत से रहूं निहारती, दिखाए कर निर्वार!
कभी-कभी वह पूछता परिमार्जन का, है कोई विचार?
ढूंढने लगती मैं खामोश हो, अपने ही मन के विकार!
अक्स है लहरों की तरह, जैसा होता, वैसा ही दिखाता,
सागर से निकलतीं-समातीं, वह मुझ में ही समा जाता!
अक्स-सा कोई सगा न मेरा, अक्स-सा नहीं मीत,
अक्स से जीवन सजे, अक्स ही जीवन-गीत।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
