बदलता समाज
विधा- कविता
शीर्षक- बदलता समाज
बदलता हुआ समय है, बदलता समाज है,
जैसा समाज कल था वैसा नहीं रहा आज है,
संस्कार बदल गए, रीतियां भी बदल गईं,
कुछ भी कर लो, पहन लो, कह दो कि रिवाज है!
चेहरे पर मुस्काने हैं दिल में मगर बवाल हैं,
ऊपर से शहद-से मीठे, अंदर से कड़वे कमाल हैं,
मुखौटों की कमी नहीं, जितने-जैसे चाहो लगा लो,
चिपके हुए हैं सब मोबाइल में, बुजुर्ग अकेल्रे बेहाल हैं!
रिश्तों में अब पहले सी वो गर्मी कहाँ रही है,
कोई किसी की नहीं सुनता, सबने अपनी ही कही है,
सच बोलना कठिन हुआ, झूठों का हुआ बोलबाला,
शुक्र है अब भी सुधरने की कुछ तो उम्मीद बाकी रही है!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
